माओवाद की बंदूक से वर्दी की जिम्मेदारी तकः अर्जुन ने सुनाई सब इंस्पेक्टर बनने की प्रेरक कहानी

बीजापुर : कभी माओवादी संगठन की विचारधारा और हिंसा के साये में जीवन बिताने को मजबूर रहे अर्जुन ने अब उसी क्षेत्र में पुलिस की वर्दी पहनकर शांति और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हुए अपने जीवन की नई इबारत लिखी है।
माओवाद से प्रभावित जीवन से आत्मसमर्पण, पुनर्वास और फिर पुलिस विभाग में सेवा करते हुए सब इंस्पेक्टर के पद तक पहुंचने की उनकी कहानी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बदलाव और पुनर्वास नीति की सफलता की प्रेरक मिसाल बनकर सामने आई।
पीआईबी के डायरेक्टर अरुण कुमार पी के नेतृत्व में चेन्नई से आए मीडिया प्रतिनिधियों की टीम ने 17 अगस्त को बीजापुर प्रवास के दौरान पुलिस अधीक्षक कार्यालय में डीआरजी एवं एसटीएफ के जवानों से चर्चा की।
इस दौरान जवानों ने मीडिया प्रतिनिधियों के साथ बस्तर में माओवाद के प्रभाव, नक्सली आतंक, सुरक्षा बलों के अभियानों, आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास की प्रक्रिया तथा नक्सल मुक्त बीजापुर में तेजी से हो रहे बदलावों के अनुभव साझा किए।
बचपन में संगठन से जुड़ा, विचारधारा से मोहभंग के बाद चुना मुख्यधारा का रास्ता- डीआरजी के सब इंस्पेक्टर अर्जुन ने अपने जीवन का अनुभव साझा करते हुए बताया कि माओवादी आतंक के दौर में ग्रामीण परिवारों पर संगठन से जुड़ने का दबाव रहता था। इसी भय के कारण उन्हें भी बचपन में माओवादी संगठन में शामिल होना पड़ा।
समय के साथ संगठन की गतिविधियों और उसकी हिंसक एवं संविधान विरोधी विचारधारा को करीब से देखने के बाद उनका मोहभंग हुआ। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक भय के वातावरण में रहने के बावजूद उन्होंने हिम्मत जुटाई और आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास का लाभ मिला और उन्हें डीआरजी में सेवा का अवसर प्राप्त हुआ।
शुरुआत में गोपनीय सैनिक के रूप में जिम्मेदारी संभालने के बाद लगातार मेहनत और बेहतर कार्य के माध्यम से उनकी पदोन्नति होती गई। वर्तमान में वे सब इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और शीघ्र ही निरीक्षक पद पर पदोन्नत होने की उम्मीद है।
अर्जुन की कहानी सुनकर मीडिया प्रतिनिधियों ने उनके जीवन के संघर्ष, आत्मसमर्पण के निर्णय और पुलिस सेवा तक के सफर को जाना।
उन्होंने बताया कि आज वे समाज और क्षेत्र की सुरक्षा के लिए काम कर रहे हैं, यह उनके जीवन में आए सकारात्मक बदलाव का प्रमाण है।
ऑपरेशन से लेकर आत्मसमर्पण तक बहुआयामी रणनीति- इस दौरान डीएसपी श्री विनीत साहू ने मीडिया प्रतिनिधियों को बस्तर में माओवाद के प्रभाव, नक्सली हिंसा, सुरक्षा बलों के सामने रही चुनौतियों तथा नक्सल विरोधी अभियानों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि नक्सलवाद के खिलाफ अभियान केवल सुरक्षा कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें क्षेत्र में सुरक्षा की पहुंच बढ़ाने, ग्रामीणों का विश्वास मजबूत करने, आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास को प्रोत्साहित करने तथा विकास कार्यों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने पर भी जोर दिया गया।
नक्सल विरोधी अभियानों में सुरक्षा बलों के विभिन्न दस्तों के बीच बेहतर समन्वय, क्षेत्र में सतत निगरानी, प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कार्रवाई तथा संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने जैसे प्रयास किए गए। डीआरजी और एसटीएफ जैसे विशेष बलों ने चुनौतीपूर्ण भौगोलिक एवं परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारी निभाई। इसके साथ ही आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें सम्मानजनक जीवन का अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में भी कार्य किया गया।
31 मार्च 2026 के बाद बदली बीजापुर की तस्वीर- बस्तर को 31 मार्च 2026 को नक्सल मुक्त घोषित किए जाने के बाद बीजापुर में बदलाव की नई तस्वीर दिखाई दे रही है। लंबे समय तक माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में अब सुरक्षा और विकास गतिविधियों को गति मिल रही है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासनिक पहुंच और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कार्यों के विस्तार के लिए वातावरण तैयार हुआ है।
डीआरजी एवं एसटीएफ के जवानों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि नक्सल मुक्त बीजापुर को विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ते देखना उनके लिए संतोष और खुशी का विषय है। जवानों ने बताया कि लंबे समय तक जिन क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियों के कारण सामान्य गतिविधियां प्रभावित होती थीं, वहां अब लोगों में विश्वास बढ़ रहा है और विकास की गतिविधियां आगे बढ़ रही हैं।
जवानों के अनुभवों से रूबरू हुए मीडिया प्रतिनिधि- चेन्नई से आए मीडिया प्रतिनिधियों ने जवानों से संवाद के दौरान नक्सल प्रभावित क्षेत्र में सुरक्षा बलों के अनुभव, चुनौतियों, आत्मसमर्पण के बाद जीवन में आए बदलाव और नक्सल मुक्त बीजापुर में हो रहे परिवर्तन को समझा।
जवानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि आज सुरक्षा के साथ-साथ आम नागरिकों में विश्वास और क्षेत्र में विकास की गति बढ़ना नक्सल विरोधी अभियान के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।
अर्जुन की कहानी ने इस संवाद को एक मानवीय आयाम दिया जहां कभी माओवाद के दबाव में एक बच्चे को संगठन में जाना पड़ा था, वहीं आज वही व्यक्ति संविधान और कानून की रक्षा की जिम्मेदारी निभाते हुए पुलिस की वर्दी में सेवा कर रहा है।









