CG NEWS: सस्पेंड….सस्पेंड…. सस्पेंड, अब खतम….टाटा… बाय बाय…!

CG NEWS: दंतेवाड़ा मोतियाबिंद सर्ज़री कांड उन परिवारों के लिए भी एक बड़ी घटना है , जो इसके पीड़ित हैं और उस छत्तीसगढ़ प्रदेश के लिए भी चिंताजनक है, जो आने वाले कुछ दिनों में पचीसवें साल में दाख़िल होने वाला है । क्या इसे महज़ एक हादसा मान लिया जाए…?  अगर हादसा है तो फ़िर सरकार इस मामले में लापरवाही मानकर सर्जन डॉक्टर और दूसरे कर्मचारियों को सस्पेंड क्यों कर रही है….?

अगर लापरवाही है तो फ़िर क्या उसका दायरा कुछ चंद लोगों तक ही मान लिया जाए … ?  और यह भी मान लिय़ा जाए कि ऐसी लापरवाहियों में ज़िम्मेदार लोगों का कोई इको सिस्टम नहीं है । यानी अस्पताल में सर्ज़री करने वालों से ऊपर और कोई भी ज़िम्मेदार नहीं है। सरकार जब सफल ऑपरेशन की वाहवाही की हक़दार है तो क्या ऐसी लापरवाही पर उसकी ओर उंगली भी नहीं उठ सकती….? क्या जैसे पहले की लापरवाहियों में एसपी, थानेदार, तहसीलदार, पटवारी आदि-आदि ज़िम्मेदार लोगों को सस्पेंड किया जाता रहा या उन्हे तबादले की सजा दी जाती रही है, ठीक उसी तरह मोतियाबिंद सर्जरी कांड में भी निलंबन की इस “बड़ी” कार्रवाई के बाद अब मैटर क्लोज़ हो जाएगा…। सब ख़तम… टाटा…. बाय-बाय…..?  

यह ख़बर मीडिया में तफ़सील से आ चुकी है कि दंतेवाड़ा के जिला अस्पताल में आंखों के ऑपरेशन के दौरान क्या हुआ है…। कितने लोग संक्रमण की चपेट में आ गए और कितने लोगों के सामने अब यह सवाल है कि क्या उनकी आँखों की रोशनी ब़रक़रार रह पाएगी या नहीं…..?

यह खबर भी सुर्ख़ियों में है कि कैसे सरकार ने “सख़्त तेवर” दिखाए और “बड़ा एक्शन” लेकर  तीन लोगों को सस्पेंड कर दिया है। पूरा प्रदेश जान गया कि सरकार एक्शन में है…। जो लोग अपनी आंखों की रोशनी बेहतर करने की आस में ऑपरेशन कराने के बाद संक्रमण के शिकार हुए हैं, ईश्वर करे कि सभी की रोशनी वापस आ जाए। लेकिन फ़िलहाल तो वे इन सुख़िर्यों को अपनी आंखों सो नहीं पढ़ सकते…।

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मगर बंद आंखों में उनके दिलो-दिमाग पर क्या चल रहा होगा… इसे पढ़ने की कोशिश कोई कर रहा है….? क्या उनके मन में सरकारी सिस्टम के प्रति भरोसा नहीं डगमाएगा….?  बरसों पहले इसी छत्तीसगढ़ में एक नसबंदी कांड हुआ था । उसके बाद नसबंदी जैसे राष्ट्रीय अभियान पर कितना असर हुआ – इस पर भी ख़ोजबीन की जा सकती है।

अपनी आंखों की रोशनी को दांव पर लगाकर सरकारी सिस्टम पर भरोसा करते हुए दंतेवाड़ा पहुंचे लोगों के बारे में जानकर वे लोग भी ज़रूर कुछ सोच रहे होंगे – जिनका भरोसा डगमगाया तो घेराव – प्रदर्शन करते हुए सिस्टम के ख़िलाफ सड़क पर उतर आए। हाल के दिनों में बलौदाबाज़ार, लोहारीडीह , सूरजपुर और फ़िर बलरामपुर में जो कुछ हुआ है, उसे कुछ इस तरह के नज़रिए से ही देखा जा रहा है।

ज़ाहिर सी बात है कि बैक-टू-बैक हुई इन घटनाओं की जड़ में अलग-अलग फ़ैक्टर होंगे। लेकिन एक बात कॉमन नज़र आती है कि लोगों के मन में सिस्टम के प्रति गुस्सा दिखाई दिया। हो सकता है कि सिस्टम में बैठे लोगों की “तपस्या” में किसी तरह की कमी रही हो और वे लोगों का भरोसा मज़बूत करने में नाकाम रहे हों। सिस्टम के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरने वाले लोगों को भी गलत करार दिया जा सकता है।

लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे अमन चैन पसंद इलाक़े में जो कुछ हो रहा है, वह सबके सामने है। इन घटनाओं के साथ दंतेवाड़ा मोतियाबिंद सर्ज़री कांड का ज़िक्र करने के पीछे दरअसल वज़ह यही है कि सबके साथ सिस्टम पर भरोसा ही सवालों के गोल घेरे में दिखाई दे रहा है। कहीं पर लोग भरोसा डगमगाने की वज़ह से संकट में हैं तो कहीं भरोसा करने की वज़ह से संकट में दिखाई दे रहे है…।

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कोई भी देख सकता है कि इस मामले में एक  और बात कॉमन है कि सरकार एक्शन में कहीं पीछे नहीं है। हर मामले में कोई कितना भी बड़ा हो सरकार कड़ाई के साथ सस्पेंड करती है या तबादला करके सज़ा दे देती है। पूरा पैकेज है। लापरवाही करने वाला जब तक करना है करे…. पकड़ा गया तो उसे बख्शा नहीं जाएगा….. फ़ौरन सस्पेंड ….। ना इससे कुछ ऊपर…. और ना इससे कुछ नीचे….। दायरा फ़िक्स है…। जो सस्पेंड किया जा रहा है, उससे ऊपर कोई ज़िम्मेदार नहीं है और नीचे वाले को तो सवाल ही नहीं उठता….। विपक्षी दल कुछ बोलेगा तो सियासत शुरू हो जाती है । और अगर किसी घटना में जिम्मेदार लोगों में से किसी का रिश्ता विपक्षी दल के साथ पकड़ में आ गया तो ख़ामोशी उनकी मज़बूरी है। फ़िर कौन बोलेगा… और घूमता हुआ आईना दिखाएगा।

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