दख़लः सरकंडा से उठा बवाल “साइलेंट मोड” में तो है… लेकिन सवाल गूंज रहा है -क्या “सिस्टम” के एक हिस्से का दूसरे पर भरोसा नहीं…?

( गिरिजेय ) कोई पूछ सकता है कि बलौदा बाजार, कवर्धा, सूरजपुर, बलरामपुर जिलों में हुए बवाल की तरह बिलासपुर में भी बवाल कट रहा है क्या…? लेकिन असली सवाल तो यह है कि बिलासपुर में जो कुछ हुआ या हो रहा है , उसके भीतर कौन सा गंभीर सवाल छिपा हुआ है…? चूंकि बिलासपुर में जो कुछ हुआ है वह बाकी जिलों में हुए बवाल से काफी अलग है। बाकी जिलों में सिस्टम पर से आम लोगों का भरोसा टूटता हुआ दिखाई दिया था । जबकि बिलासपुर में सिस्टम के दो हिस्से ही आमने-सामने है। जिसे देखकर कोई पूछ सकता है कि क्या सिस्टम के एक हिस्से को ही अब दूसरे हिस्से पर भरोसा नहीं है । जिन महकमों पर लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने का ज़िम्मा है , उन महकमों के ज़िम्मेदार लोगों के बीच संवाद में अगर यह बात निकलकर आती हो कि पुलिस किसी कार्यपालिक मजिस्ट्रेट को झूठे मामले में फंसाने की कोशिश कर रही है….. तो आम लोग शायद अपने आप से ही सवाल कर सकते हैं कि – सिस्टम पर भरोसे की जिस डोर को हम पकड़े हैं, वह आख़िर कितनी मजबूत है…?
बात हो रही है हाल ही में सरकंडा इलाके में हुई उस घटना की…. जो इन दिनों बिलासपुर मीडिया की सुर्खियों में है। सोशल मीडिया में वायरल हो रहे ऑडियो – वीडियो बता रहे हैं कि किसने – क्या कहा…? यह खबर सभी जान चुके हैं कि बस्तर इलाके में तैनात नायब तहसीलदार ( एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ) पुष्पराज मिश्रा देर रात ट्रेन में रायपुर से आकर अपने पिता और भाई के साथ अपने घर अशोकनगर सरकंडा लौट रहे थे। इसी दौरान पुलिस ने रोककर उनके साथ ऐसा सलूक किया, जिसकी उम्मीद उन्हें नहीं थी। इस मामले में आईजी ने सरकंडा के थानेदार को लाइन हाजिर कर दिया है ।
इस घटना को लेकर छत्तीसगढ़ में बवाल मचा । किसी ने सड़क पर आकर इसका विरोध नहीं किया । लेकिन छत्तीसगढ़ कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ सामने आया आया और राजस्व विभाग के एक अफ़सर के साथ पुलिस के रवैये पर नाराज़गी जताई । संगठन का अपना तरीका है और वे लिखा-पढ़ी के ज़रिए अपना गुस्सा जता रहे हैं।जिससे बवाल “साइलेंट मोड” पर नज़र आता होगा । छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए बवाल से यह बवाल कुछ अलग है। जिसमें दोनों तरफ़ आम लोगों के बीच से कोई चेहरा सामने नहीं है। अलबत्ता सरकार के ही सिस्टम का एक हिस्सा सिस्टम के दूसरे हिस्से के खिलाफ खड़ा हुआ नजर आ रहा है। जैसा छत्तीसगढ़ कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ की ओर से मुख्यमंत्री ,उपमुख्यमंत्री, गृह मंत्री के नाम कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन से समझ में आ रहा है । संगठन का गंभीर आरोप है कि सरकंडा पुलिस बिना किसी ठोस कारण नायब तहसीलदार को थाने ले गई और शराब पीने के झूठे आरोप में फंसाने की कोशिश की । साथ ही एक महत्वपूर्ण बात लिखी है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासनिक सेवाओं और पुलिस विभाग के बीच बेहतर समन्वय – प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

इसी तरह बस्तर जिले में पदस्थ नायब तहसीलदार पुष्पराज मिश्रा ने कलेक्टर के नाम आवेदन में घटना का जो विवरण लिखा है उसे पूरा पढ़ कर कोई भी सहम जाएगा। जिसमें उन्होंने सिलसिलेवार बताया है कि उस रात पिता और छोटे भाई की मौज़ूदगी में उन पर क्या बीती। कलेक्टर का फ़ोन आने के बाद थानेदार ने क्या कमेंट किया ।
अभी घटना की जांच ज़ारी है। लिहाज़ा हम किसी नतीज़े पर नहीं पहुंच सकते और ना हम किसी हिस्से को सही या गलत क़रार दे सकते हैं। लेकिन यह सवाल अब भी अपनी जगह बैठा है कि बेहतर प्रशासन के बाद भी बिलासपुर में इस तरह की ख़बर सुर्ख़ियों में क्यों आ रही है…? बिलासपुर जिले में प्रशासन और पुलिस का काम अब तक इस तरह नजर आ रहा है, जिसमें आम लोग और सिस्टम के बीच टकराहट की गुंजाइश नजर नहीं आती । कलेक्टर गिरदावरी करने धान काटने के लिए हंसिया लेकर खेत में उतरते है। पुलिस कप्तान ख़ुद रात में गश्त करते हुए छापा मारते हैं। आम लोगों के साथ सीधे जुड़ाव का यह बेहतर नमूना कहा जा सकता है। लेकिन सरकंडा इलाके में हुई यह घटना उस मुहावरे की याद दिलाती है, जिसमें बच्चों के बीच झगड़े में कुछ बच्चे “चिमट के झगड़ा करने वाले…” बच्चे के नाम से पहचाने जाते हैं । कथित तौर पर ट्रेन से उतरकर सीधे रास्ते घर जा रहे किसी शख्स के साथ इस तरह का बर्ताव कुछ ऐसे ही कॉलम में रखा जा सकता है। बवाल मचा तो यह सोचने की भी मजबूरी आती है कि रोजाना देर रात इस तरह काम से काम रखकर अपने घर आने – जाने वालों के साथ क्या ऐसा व्यवहार नहीं हो सकता ? अफसरों के संगठन ने जब बात उठाई तो पूरे प्रदेश में हलचल मच गई। लेकिन पता नहीं कितने लोग इसी तरह का बर्ताव सहकर अपने घर लौटते होंगे।
लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि सरकार के सिस्टम का एक हिस्सा दूसरे हिस्से पर भरोसा क्यों नहीं कर पा रहा है। पुलिस और राजस्व दोनों विभाग ऐसे हैं जिन पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। लेकिन अगर इन दो विभागों से जुड़े जिम्मेदार लोग ही एक दूसरे पर भरोसा न कर पा रहे हो तो क्या पूरा सिस्टम ही सवालों के गोल घेरे में नहीं आ जाएगा…? एक विभाग के लोग दूसरे विभाग पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं कि एक प्रशासनिक अधिकारी को झूठे आरोप में फंसाने की कोशिश की गई। जांच में यह सामने आएगा कि यह आरोप कितना सही है । लेकिन किसी विभाग के लोग सरकार के ही सिस्टम पर अगर इस तरह के आरोप लगाते हैं तो सोचना पड़ता है कि क्या ऐसा भी हो सकता है .. ? वैसे तो देर रात आने- जाने वालों की जांच – पड़ताल रोजाना गस्त का हिस्सा है और चौकसी के लिए जरूरी है। अपराध की घटनाओं को समय से पहले रोकने के लिए यह एक जरूरी कदम है। पुलिस की इसी चौकसी में कई बार बड़े मामले पकड़े जाते हैं। फिर भी इस सवाल का जवाब तो सिस्टम को देना ही होगा कि क्या सामान्य लोग भी जरूरत पड़ने पर रात के समय सड़क पर आना-जाना बंद कर दें…? क्या ऐसे समय किसी मजबूरी में बाहर निकलने वाले लोगों को पुलिस चाहे तो झूठे मामले में फंसा सकती है….?
दूसरे जिले में हुई घटनाओं के कारण बिलासपुर में भी प्रशासनिक स्तर पर बड़े ओहदे पर बैठे अफसरों ने सिस्टम को टाइट तो किया है। मुमकिन है इस वज़ह से भी सिस्टम के ही लोगों में बेचैनी बढ़ी है और अपने हाथ बंधे हुए महसूस कर रहे लोग अपने हाथ खोलने की कोशिश में ऐसी चूक कर रहे हैं, जिससे सिस्टम के दो हिस्सों को आमने -सामने आना पड़ रहा है। सिस्टम पर भरोसे की डोर को ऐसे लोग कमज़ोर करेंगे तो आम आदमी फ़िर कहा जाएगा… ?









