“जातिगत जनगणना जरूरी…. या सत्ता हेतु मजबूरी “

मुद्दा
जब भूख है
मैं जो अनपढ़ हूं
तुम जो पढ़े लिखे हो
मैं सवर्ण हूं तुम आदिवासी हो दलित हो पिछड़े हो
हिंदू हो मुसलमान हो तुम्हें भी बहुत भूख लगती है और मुझे भी बहुत भूख लगती है भूख एक मुद्दा है
और
विरोध एक जरूरत फिर हम सब साथ क्यों न लड़े भूख के विरुद्ध ।। प्रख्यात कवि धूमिल की ये लाइन कितनी सही है
“”””आज देश में ज्वलंत प्रश्न चारों ओर है जनगणना जातिगत प्रश्न क्या जातिगत जनगणना से देश में बाहर आ जाएगी कोई भूखा नहीं सोएगा या देश के लिए अंतिम रास्ता है खुशहाल बनाने के लिए या सिर्फ मेहनतकश अवाम को गुमराह करना है किसी अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए ?
देश में 1931 में जनगणना हुई थी जिसका उद्देश्य था शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भारतीय परिवारों की आर्थिक स्थिति का आकलन करना तथा साथ ही विभिन्न जातियों की जाति अनुसार आर्थिक डाटा एकत्रित करना भी इसका उद्देश्य था  । परंतु 1951 के बाद जातिगत जनगणना के आंकड़े विभाजनकारी माने जाने के कारण बंद कर दिए गए थे । जनगणना में सिर्फ अनुसूचित जनजातीय और अनुसूचित जाति के आंकड़े एकत्रित किए जाते थे । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 में जनगणना का प्रावधान है  परंतु इसमें कहीं अंकित नहीं है कि यह कितने साल के अंतराल में कराई जाएगी और जातिगत जनगणना कराया जाएगा । इसका कोई प्रावधान संविधान में नहीं है  ।

वैसे एक परंपरा ब्रिटिश सरकार के द्वारा बनाई गई है हर 10 वर्ष के बाद जनगणना कराई जाती है । अंतिम जनगणना देश में 2011 में माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कराई गई थी । उस समय मार्च 2011 में तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम द्वारा संसद में यह कहा गया था जातिगत जनगणना कराया जाना संभव नहीं है । यह प्रक्रिया जटिल हो जाएगी  ।2011 से लगभग 3 वर्ष माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सत्ता में रहे  ।परंतु जनगणना का रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुआ । पुनः जनगणना 2021 में कराया जाना था जो कि करोना आपदा के कारण स्थगित हो गया । आज सड़क से संसद तक कांग्रेस जातिगत जनगणना के लिए आवाज उठा रही है । उनके घोषणा पत्र में भी है यदि वह सत्ता में आएंगे तो जातिगत जनगणना करेंगे ।

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जातिगत जनगणना समस्या का अंतिम समाधान है । क्या इसके पूर्व देश में जनगणना हुई उसमें अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति का आंकड़ा पृथक से रखा जाता था  ।देश में परंतु 1955 में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया  ।”काका केलकर” जिसमें पिछड़े वर्ग की आर्थिक स्थिति सामाजिक स्थिति का अध्ययन कर कमीशन द्वारा रिपोर्ट तैयार किया गया परंतु आज दिनांक तक उसे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और न ही तत्कालीन हुकूमत ने कमीशन की रिपोर्ट को महत्व दिया । फिर 1990 में मंडल कमीशन आया और ओबीसी पिछडा वर्ग को उसमें आरक्षण का प्रावधान लाया गया । तब भी देश में चारों तरफ आंदोलन और कानून व्यवस्था की स्थिति निर्मित हो गई । समाज में एक विभाजन की रेखा खिंच गई  ।जिसकी पीड़ा देश आज तक भुगत रहा है  ।आज भी गुजरात में पटेल समाज आरक्षण के लिए आंदोलनरत रहे  ।राजस्थान ,हरियाणा में जाट गुर्जर आंदोलनरत ,उत्तर प्रदेश में गुर्जर, महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण हर कोई आरक्षण चाह रहा है  ।जबकि यह वर्ग आर्थिक समाजिक दृष्टि से पिछड़ा नहीं । भावनात्मक रूप से यह पूरी जाति आंदोलित हो जाती है ।

महाराष्ट्र में ज्वलंत समस्या है मराठा आरक्षण आरक्षण । एक पुरानी कहावत है यदि कोई भूखा है तो उसे मछली देने की जरूरत नहीं है उसे जाल दीजिए जिससे वह मछली पकड़ कर अपना व्यापार कर सके और आत्मनिर्भर बन सके या हकीकत है  ।देश में किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव नहीं है । बाबा साहब परम पूज्य डॉ आंबेडकर का कथन था कि वंचित आदिवासी एवम अनुसूचित जाति लोगों को विशेष अवसर प्रदान किया जाना अनिवार्य है  ।जिसे भारतीय संविधान में देश में लागू किया । बाबा साहब बहुत पवित्र उद्देश्य से यह प्रावधान संविधान में प्रभावशील किए थे । परंतु क्षुद्र स्वार्थ की चुनावी राजनीति जो आज भी जारी है ।

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जातियों को आपस में लड़ा कर उन्हें लॉलीपॉप दिखाकर उनका वोट हासिल किया जाए  ।क्या यह सकारात्मक परिणाम प्रदान करेगा ? या अच्छी व्यवस्था एवं अच्छा अवसर हर किसी को प्रदान करना बुनियादी सुविधा समाज के हर वर्ग को मिले विशेष कर जो वंचित हैं ,अंतिम पायदान पर खड़े हैं । चाहे किसी भी जाति के हो यह उत्तम होगा ना कोई भेदभाव जब भी आप जातिगत जनगणना आदिवासी एवं अनुसूचित जाति को पृथक कर करायेंगे तो सब तरफ आरक्षण की मांग प्रारंभ हो जाएगी  ।जिससे समाज का वह वर्ग जो अनादि काल से मुख्य धारा में नहीं जुड़ पाया वह फिर आदिवासी और अनुसूचित जाति पीछे छूट जाएगा  ।हमें उनका हक मार कर अन्य जातियों को देना पड़ेगा जो न्यायोचित और मानवीय नहीं है  उन्हे विशेष अवसर हर क्षेत्र मे अधिक देना होगा ।

क्या माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी का यह कथन कि मेरे लिए सिर्फ चार जातियां हैं ‘पहले मजदूर ,’दूसरा किसान ,’तीसरा महिला ‘चौथा युवा- इन सब को दृष्टिगत रखते हुए सारी योजनाएं विकसित भारत के लिए बनाना है यह गलत है क्या ? जब समाज के उक्त चार वर्ग के चेहरे में ईमानदार प्रयास से मुस्कान होगी तो निश्चित रूप से सशक्त समाज और सशक्त देश का निर्माण होगा  । यह नींव है और जब बुनियाद मजबूत होगी तो उसे पर खड़ी मीनार अनेक तूफान का सामना करने के लिए तैयार रहेगी ।

यह गंभीर बहस का मुद्दा है जातिगत जनगणना के परिणाम और दुष्परिणाम क्या होंगे छोटे-छोटे समूह में भेदभाव और मतभेद उत्पन्न होने की अधिक संभावना है । आज हमारे सामने जो प्रश्न है वह केवल सैद्धांतिक नहीं उसका संबंध हमारे जीवन की सारी प्रक्रियाओं से है उसके समुचित निदान और समाधान पर हमारा भविष्य निर्भर करता है ।
स्वर्गीय परम पूज्य राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता की दो लाइन है —
“समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल ब्याध ,

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जो तटस्थ हैं –समय लिखेगा उनका भी अपराध””

दीपक पाण्डेय, बिलासपुर( राजनीतिक विश्लेषक गैर पेशेवर )

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