पूर्व सेना प्रमुख की किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी पर संसद से सड़क तक क्यों है संग्राम?
पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे ने अपनी आत्मकथा के रूप में ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ (Four Stars of Destiny) लिखी है, जिसे पेंगुइन रैंडम हाउस द्वारा प्रकाशित किया जाना था। मूल रूप से यह किताब जनवरी 2024 में बाजार में आने वाली थी, लेकिन दिसंबर 2023 में एजेंसी द्वारा इसके कुछ अंश सार्वजनिक किए जाने के बाद भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय ने इसकी विस्तृत समीक्षा शुरू कर दी।

संसद के बजट सत्र के दौरान सोमवार को लोकसभा में उस समय जबरदस्त राजनीतिक गहमागहमी देखने को मिली, जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की एक अप्रकाशित किताब का मुद्दा उठाया। राहुल गांधी के दावों पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने तुरंत मोर्चा संभाला और कड़ा ऐतराज जताया।
सरकार की ओर से स्पष्ट रूप से कहा गया कि संसदीय परंपराओं के अनुसार, सदन में किसी भी ऐसी किताब, पत्रिका या लेख का हवाला नहीं दिया जा सकता जो प्रकाशित न हुई हो और जिसकी तथ्यों की विश्वसनीयता प्रमाणित न हो। इस तीखी बहस ने देश का ध्यान उस किताब की ओर खींच लिया है जो पिछले दो वर्षों से रक्षा मंत्रालय की अनुमति के इंतजार में अधर में लटकी हुई है।
पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे ने अपनी आत्मकथा के रूप में ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ (Four Stars of Destiny) लिखी है, जिसे पेंगुइन रैंडम हाउस द्वारा प्रकाशित किया जाना था। मूल रूप से यह किताब जनवरी 2024 में बाजार में आने वाली थी, लेकिन दिसंबर 2023 में एजेंसी द्वारा इसके कुछ अंश सार्वजनिक किए जाने के बाद भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय ने इसकी विस्तृत समीक्षा शुरू कर दी। इस किताब में 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच हुए गंभीर सैन्य संघर्ष और 2023 में लागू की गई ‘अग्निवीर’ भर्ती योजना जैसे बेहद संवेदनशील और रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा की गई है।
सरकार का तर्क है कि ऐसे विषयों पर किसी भी सैन्य अधिकारी के विचार सार्वजनिक होने से पहले उनकी गहन जांच आवश्यक है।
सैन्य अधिकारियों के किताब लिखने या सार्वजनिक रूप से विचार व्यक्त करने को लेकर भारत में कड़े नियम हैं। भारतीय सेना नियम 1954 की धारा 21 के अनुसार, सेवा में रहते हुए कोई भी कर्मचारी किसी भी राजनीतिक प्रश्न या सेवा से संबंधित मामले पर सरकार की पूर्व अनुमति के बिना कुछ भी प्रकाशित नहीं कर सकता।
इसमें सेना, रक्षा या बाहरी संबंधों से जुड़ी जानकारी को गुप्त रखना अनिवार्य है। हालांकि, रिटायर हो चुके अधिकारियों के लिए नियम थोड़े अलग और कुछ हद तक स्पष्टता की मांग करते हैं।
वर्तमान में, रिटायर रक्षा अधिकारियों के लिए कोई विशेष लिखित प्रक्रिया नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार ने जून 2021 में सिविल सेवा (पेंशन) नियमों में संशोधन किया था, जिसके तहत खुफिया या सुरक्षा संगठनों से जुड़े पूर्व कर्मियों को संवेदनशील जानकारी प्रकाशित करने से पहले अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है।
जनरल नरवणे की यह किताब फिलहाल रक्षा मंत्रालय की समीक्षा प्रक्रिया के दायरे में है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई उच्च पदस्थ अधिकारी ऐसी किताब लिखता है जिसमें सैन्य अभियानों या सरकार की रणनीतिक नीतियों का जिक्र हो, तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से उसकी समीक्षा की जाती है ताकि कोई गोपनीय जानकारी सार्वजनिक न हो जाए। मंत्रालय की इसी रोक के कारण ऑनलाइन प्लेटफार्मों ने भी इस किताब के प्री-ऑर्डर रद्द कर दिए हैं। संसद में राहुल गांधी द्वारा इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद अब यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक विवाद बन चुका है।









