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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सरकारी नौकरी की योग्यता तय करने में राज्यों की मनमानी खत्म, केंद्र के नियम ही होंगे सर्वोपरि

नई दिल्ली। देश में सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया और योग्यता निर्धारण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी पद के लिए अनिवार्य योग्यता और अर्हता तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, तो राज्य सरकारें उसमें अपनी ओर से कोई अतिरिक्त शर्त या बदलाव नहीं जोड़ सकतीं।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने ‘ड्रग इंस्पेक्टर’ भर्ती से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया, जिसका असर भविष्य की कई अन्य भर्तियों पर भी पड़ेगा।

क्या था विवाद: केंद्र बनाम राज्य की ‘योग्यता’
यह पूरा मामला हरियाणा और कर्नाटक में ड्रग इंस्पेक्टर के पदों पर भर्ती से जुड़ा था। केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए ड्रग रूल्स, 1945 के नियम 49 के तहत इस पद के लिए कुछ निश्चित शैक्षणिक योग्यताएं तय की गई हैं। हालांकि, हरियाणा और कर्नाटक सरकारों ने संविधान के अनुच्छेद 309 का हवाला देते हुए अपने सेवा नियमों में बदलाव कर दिया।

उन्होंने ‘अनुभव’ (Experience) को शुरुआती नियुक्ति के लिए ही अनिवार्य बना दिया था, जबकि केंद्रीय नियमों के अनुसार यह केवल विशेष प्रकार के निरीक्षणों के लिए आवश्यक था। इसके चलते कई योग्य उम्मीदवार भर्ती प्रक्रिया से बाहर हो गए थे।

संविधान के अनुच्छेद 309 की सीमाएं तय
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि राज्यों के पास अनुच्छेद 309 के तहत भर्ती नियम बनाने की शक्ति तो है, लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है।

कोर्ट ने कहा राज्य सरकार के नियम केंद्रीय कानून या उसके तहत बने नियमों के साथ असंगत (Inconsistent) नहीं होने चाहिए।जब कोई विषय (जैसे ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट) पहले से ही केंद्रीय कानून के दायरे में आता है, तो राज्यों द्वारा अतिरिक्त योग्यताएं थोपना ‘अल्ट्रा वायर्स’ (कानून के दायरे से बाहर) माना जाएगा।

नियम 49 के तहत ‘अनुभव’ केवल कार्य के बटवारे के लिए है, न कि नौकरी में प्रवेश के लिए अनिवार्य योग्यता।

चयन सूची फिर से बनाने का आदेश: हजारों उम्मीदवारों को राहत
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC) और कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) को कड़े निर्देश जारी किए हैं। आयोग उन सभी उम्मीदवारों को शामिल करते हुए फिर से चयन सूची बनाए, जो केंद्र द्वारा तय शैक्षणिक योग्यता पूरी करते हैं। राज्यों द्वारा थोपी गई ‘अनिवार्य अनुभव’ की शर्त को नजरअंदाज किया जाए।

जो लोग पहले ही नियुक्त हो चुके हैं लेकिन नई मेरिट लिस्ट में जगह नहीं बना पाते, उन्हें सेवा से हटाना अनिवार्य नहीं होगा। यह राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर करेगा, लेकिन उन्हें वरिष्ठता सूची में सबसे नीचे रखा जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आयोगों को 8 सप्ताह के भीतर अंतिम मेरिट लिस्ट जारी करने और संबंधित राज्य सरकारों को भेजने का निर्देश दिया है। सरकारों को इसके अगले 8 सप्ताह में नियुक्तियां प्रदान करनी होंगी।

एक देश, एक योग्यता की ओर कदम
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से पूरे देश में वैधानिक पदों (Statutory Posts) के लिए योग्यता में एकरूपता आएगी।

अब राज्य सरकारें राजनीतिक या क्षेत्रीय हितों के आधार पर भर्ती नियमों को इतना कठिन नहीं बना पाएंगी कि वह केंद्रीय कानून की मूल भावना के खिलाफ चला जाए।

Shri Mi

पत्रकारिता में 8 वर्षों से सक्रिय, इलेक्ट्रानिक से लेकर डिजिटल मीडिया तक का अनुभव, सीखने की लालसा के साथ राजनैतिक खबरों पर पैनी नजर

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