Supreme Court Decision-खेल के मैदानों पर झुग्गी पुनर्वास के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, सरकार को नोटिस

Supreme Court Decision/देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में घटते हरित क्षेत्र (Green Cover) और झुग्गी पुनर्वास (SRA) योजनाओं के बीच छिड़ी कानूनी जंग अब देश की सर्वोच्च अदालत पहुंच गई है।
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को महाराष्ट्र सरकार, वृहद मुंबई महानगरपालिका (BMC) और झुग्गी पुनर्वास प्राधिकरण (SRA) को नोटिस जारी कर इस संवेदनशील मामले पर जवाब तलब किया है।
मामला मुंबई उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसमें उद्यानों और खेल के मैदानों के लिए आरक्षित जमीनों पर झुग्गी पुनर्वास योजनाओं को लागू करने की अनुमति दी गई थी। इस याचिका ने मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहर में सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा और गरीबों के आवास के अधिकार के बीच एक बड़ी बहस छेड़ दी है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान की दलीलों पर गौर किया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए दीवान ने उच्च न्यायालय के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि मुंबई में पहले से ही खुले स्थानों की भारी कमी है, ऐसे में आरक्षित भूखंडों पर निर्माण की अनुमति देना शहर के पर्यावरण और जनहित के लिए घातक साबित हो सकता है।
उन्होंने दलील दी कि सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है और आरक्षित जमीनों का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए जिसके लिए उन्हें चिन्हित किया गया है।
यह कानूनी विवाद बॉम्बे हाई कोर्ट के जून 2025 के उस ऐतिहासिक फैसले से शुरू हुआ था, जिसमें विकास नियंत्रण और संवर्धन विनियम (DCPR) 2034 के एक खास नियम (विनियम 17(3)(d)(2)) की वैधता को बरकरार रखा गया था। उच्च न्यायालय ने तब माना था कि मुंबई में आवास की भारी समस्या को देखते हुए झुग्गी पुनर्वास आवश्यक है।
कोर्ट ने तर्क दिया था कि आरक्षित मैदानों पर निर्माण की अनुमति तभी दी जाएगी जब उसका एक हिस्सा आम जनता के लिए फिर से बहाल कर दिया जाए। इस फैसले को ‘आश्रय के संवैधानिक अधिकार’ और ‘हरित आवरण’ के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर देखा गया था, लेकिन पर्यावरण प्रेमियों ने इसे पार्कों के अस्तित्व के लिए खतरा बताया है।
गैर सरकारी संगठन ‘एलायंस फॉर गवर्नेंस एंड रिन्यूअल’ (NAGAR), नीरा पुंज और नैना कठपालिया ने इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि इस नियम की आड़ में खेल के मैदानों और बगीचों का कंक्रीटकरण हो जाएगा, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए खुले स्थानों की उपलब्धता समाप्त हो जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अब मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है और इस पर शीघ्र निस्तारण के संकेत दिए हैं।









