कहानी शिक्षाकर्मी की (एक )- पैदाइश से ही कैसे शुरू हुआ शोषण का सिलसिला..?

kahani_shikshakarmi_ki(गिरिजेय) पूर्व राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाएगा। इस दिन शिक्षकों का सम्मान किया जाएगा और उनकी अहमियत  पर कसीदे पढे जाएंगे। यह दिन हर साल आता है और हर साल यही सिलसिला चलता है। इस रिवाज की रस्मअदायगी इस बार भी होगी। लेकिन कोई यह सोचने के लिए खाली नहीं है कि इस रस्मअदायगी से हम क्या हासिलल कर पाते हैं ? यह सवाल खासकर उस समय हमारे  जेहन में उतरता है जब हम आज के शिक्षकों की हालत पर नजर डालते हैं। यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि आज के दौर में बुनियादी शिक्षा का बोझ अपने सर पर उठाए सरकारी स्कूलों में करीब 80 फीसदी शिक्षक पंचायत या शिक्षक नगरीय निकाय (  शिक्षाकर्मी)  हैं। इन गुरूजनों की हालत भी किसी से छिपी नहीं है। उनके हालात पर cgwall.com ने पड़ताल करने की कोशिश की है और जो तस्वीरर हमारे सामने आई उसे  हम सिलसिलेवार -किस्तवार  पेश कर रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि  व्यवस्था  के जिम्मेदार लोग इस पर गौर कर कोई ऐसा कदम उठाएंगे जिससे हालात बदले और  गुरूजनों को सही में सम्मान मिल सकेः-



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                                      शिक्षक दीपक की तरह होता है…खुद को जलाकर विद्यार्थियों के जीवन के रौशन करता है। वैसे तो यह उक्ति प्रतिकात्मक होकर रह गई है। खासकर शिक्षाकर्मियों के मामले में यह उक्ति सोलह आने सच जान पड़ती है।  लगता है कि शिक्षाकर्मी सचमुच में खुद को जलाकर समाज को रौशन करने की जद्दोजहद में लगे है और उनकी हथेलियां ताप सहकर भी दीपक को बुझने नहीं दे रही हैं। फिर भी शिक्षा की बुनियाद के इन पत्थरों को सहेजने  वाला कोई नजर नहीं आता।

                                        हमेशा सुनने को मिल जाता है कि शिक्षक समाज का आइना होता है। राष्ट्र निर्माता होने की भी बात कही जाती है। लोग तो शिक्षक को समाज की धूरी भी कहते मिल जाएंगे। लोगों का आज भी मानना है कि समाज की काबीलियत के पीछे शिक्षकों का अहम योगदान होता है। प्राचीनकाल से गुरू की महत्ता पर किताबों और धार्मिक ग्रंथों में अनेक कहानियां,सुक्तियां पढ़ने को मिल जाती हैं। क्योंकि हमारे देश में शिक्षकों को हमेशा विशेष सम्मानित दर्जा हासिल रहा है। लेकिन बीते दो दशकों से देश में और खासकर छत्तीसगढ़ राज्य में शिक्षकों की हालत में नकारात्मक परिवर्तन देखने को मिला है।

                                      वैसे तो शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों की स्थिति बदतर होने काफी पहले ही शुरू हो चुकी थी। छत्तीसगढ़ में शिक्षकों की बदतर स्थिति की शुरूआत तब से हुई जब देश का 26 वां सूबा मध्यप्रदेश राज्य का अविभाज्य अंग था। साक्षरता बढ़ाने और गांवों तक शिक्षा का अलख जगाने भारी संख्या में विद्यालय खोले जा चुके थे।जबकि सालों से शिक्षकों की भर्ती नहीं की जा रही थी। ।  साल 1993  की ना जाने किस मनहूस घड़ी में तात्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के मन में ख्याल आया कि क्यों ना शिक्षकों की इस भारी कमी को पूरा करने के लिए पंचायत स्तर पर शिक्षकों की भर्ती की जाए। जिससे सरकार को आर्थिक नुकसान भी ना हो और शिक्षकों की कमी भी दूर हो जाए।  योजना को अमलीजामा जामा पहनाया गया। ऐसे भर्ती शिक्षकों के लिए नया शब्द अस्तित्व में लाया गया जिसे लोग आज “शिक्षाकर्मी ” कहते हैं।



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            शिक्षाकर्मी शब्द के अवतरण के बाद से ही शिक्षकों के शोषण का दौर शुरू हो गया।  जो आज तक बदस्तूर जारी है। तीन स्तरों पर नियुक्तियों की योजना बनाई गयी। प्राथमिक स्तर पर शिक्षाकर्मी वर्ग-03, पूर्व माध्यमिक स्तर पर शिक्षाकर्मी वर्ग-02,इसके अलावा उच्च और उच्चत्तर स्तर पर शिक्षाकर्मी वर्ग-01 कहा गया। सरकार ने तीनों स्तर के लिए अलग अलग मानदेय क्रमशः 500, 700 और 1000 देने का एलान किया। यह मानदेय तात्कालीन समय नियमित शिक्षकों के वेतन से बमुश्किल दस प्रतिशत था।

                                               सरकार के आदेश पर इन शिक्षाकर्मियों से साल के दस महीने कार्य कराया जाता। दो महीने शिक्षाकर्मियों की नियुक्तियां रद्द कर दी जाती थीं। उस दौर में शिक्षित युवाओं ने शोषण से वाकिफ होते हुए भी इसे स्वीकार किया। चूंकि तात्कालीन समय बेरोजगारी चरम पर थी। शिक्षा विभाग में ही 10 सालों से नियुक्तियां नहीं हो रही थी। रोजगार के अवसर भी सीमित थे।

                            चूंकि शिक्षाकर्मियों की नियुक्तियां त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था पर आधारित थी। शिक्षाकर्मियों की पदास्थापना उनके गांव,जनपद और जिला से बाहर भी होती थी। ऐसे में शिक्षाकर्मियों को अपने गृहग्राम से दूर भी जाना पड़ा। मानदेय इतना कम था कि  उससे गुजर होना मुश्किल हो गया। सरकारी तुर्रा यह कि अलाटमेंट के नाम पर 6- 6 महीने तक मानदेय नहीं दिया जाता था।

( जारी है)



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