रिप्लेसमेन्ट से पहले सही डॉक्टरों का करें चुनाव..डॉ.सजल और डॉ.आसाटी ने कहा…लापरवाही भी आर्थराटीज का कारण

बिलासपुर— आज देश दुनिया में हर व्यक्ति शरीर में ज्वाईंट की पीड़ा से परेशान है। ऐेसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। समय के साथ विज्ञान ने भी जमकर तरक्की की। ज्वाइंद रिप्लेसमेंट तकनीकि का इजाद हुआ। यह बातें अपोलो हास्पिचल के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ.सजल ने कही। इस दौरान पत्रकार से आर्थोपेडिक डॉ.जी.एस.आसाटी ने चर्चा की। उन्होने बताया कि शरीर के अंगो के जोड़ बढ़ती उम्र के साथ-साथ पुराने पड़ने के साथ घिसने लगते है। कर्टिलेज यानी हड्डियों के सिरों को ढकने वाले सुरक्षा उत्तकों में खराबी आ जाती है।खराबी आने के कई कारण हैं। इससे हड्डियों में सूजन आ जाती है और जोड़ में हड्डियों में परस्पर रगड़ से खराबी आने लगती है। इस अवस्था को अर्थराइटिस कहा जाता है।

                     पत्रकारों के सवालों के जवाब में डॉ.आसाटी ने बताया कि आर्थाराइटिज के कारण हो सकते हैं। कारणों में हमारी दिनचर्चा भी शामिल है। आमतौर पर घुटनों नितंबो, उंगलियों और कमर की हड्डियों में आर्थराइटिज होता है। हालांकि कलाइयों, कोहनियों कंधों और टखनों के जोड़ भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। जोड़ों के बदलने की प्रकिया को ही ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी कहा जाता है। प्रक्रिया में बेकार हुये जोड़ो को बदला जाता है। जोड़ों में सूजन, दर्द, फूलन और जकड़न होने लगती है। बिमारी बढ़ने के साथ चलना फिरना मुश्किल हो जाता है।

                      अपोलो हाॅस्पिटल बिलासपुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डाॅ. सजल सेन ने बताया कि 22प्रतिसत  लोग आर्थराईटिस की समस्या से परेशान हैं। इसमें 60 वर्ष और उम्र वालों की संख्या ज्यादा है। आर्थराइटीज का कारण जीवन शैली एसी में रहना, वजन का बढ़ना और धूप में नही जाना भी है। टोटल ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जनी के बाद इन सब तकलीफों से काफी हद तक राहत मिल जाती है। मरीज पहले की स्थिति में पहुंच जाता है। जोड़ो की विकृतियां भी ठीक हो जाती है। अपोलो हाॅस्पिटल में अब तक किए गए सर्जरी से 95 प्रतिशत से अधिक लोगों को राहत मिली है।

                           डॉ.आसाटी ने बताया कि आर्थराइटीज मरीक को पालथी मारकर बैठना नहीं चाहिेए। आसाटी ने कहा कि रिप्लेसमेन्ट के बाद एक मरीज कम से कम 20 से 25 साल तक बिना तकलीफ के जीवन जीता है। सीमा से इससे भी अधिक हो सकती है। रिप्लेसमेन्ट में मुश्किल से एक से सवा लाख रूपए का खर्च आता है। अपोलो एक मात्र अस्पताल है जहां इतनी कम कीमत पर इलाज किया जाता है।

      इस दौरान रिप्लेसमेन्ट से फायदा पाने वाले कुछ मरीजों ने अनुभवों को साझा किया। राजाराम ने बताया कि उसकी उम्र 84 साल है। दोनों घुटने और बायें तरफ के कुल्हे का सफलतापूर्वक रिप्लेसमेन्ट किया गया। 3 साल हो चुके हैं। दर्द नहीं होने से अब दिनचर्या ठीक ठाक है। कवर्धा की दुर्गावती ने बताया कि उसकी उम्र 58 साल है।घुटना प्रत्यारोपण लगभग 2 महीने पहले हुआ। अब घुटने में दर्द नहीं है। सर्जरी के बाद उसका दैनिक जीवन पहले की तरह हो गया है।

                                 जांजगीर की गीता साहू ने बताया कि दाहिन कुल्हे का प्रत्यारोपण अपोलो में किया गया। प्रत्यारोपण से पहले असहनीय दर्द झेलना पड़ता था। सर्जरी के बाद सब कुछ सामान्य हो गया।

           ज्वाइंट सर्जन डाॅ. असाटी ने बताया पहले घुटने  और कुल्हें के अर्थराइटिस का ईलाज दवा, फिजियाथेरेपी, सावधानियां एवं लाइफ स्टाईल मोडिफिकेशन से किया जाता है। बिमारी के बढ़ने जोड़ प्रत्यारोपण से ही ठीक किया जा सकता है। घुटनों का प्रत्यारोपण में खराब कार्टिलेज को मेटल लेयर से बदला जाता है। उन्होंने बताया कि जोड़ों में होने वाले हर दर्द का ईलाज सर्जरी नहीं है। लेकिन घुटने और कुल्हें के जोड़ में होने वाले एडवांस अर्थराइटिस जोड़ों के टेढ़ापन का ईलाज बिना सर्जरी के संभव नहीं है।

                     फिजियोथेरेपी विभाग के प्रमुख डाॅ. विक्रम साहू ने प्रत्यारोपण के लिये सही डाॅक्टर का चुनाव को महत्व दिया। उन्होने शरीर के वजन को नियंत्रण करने को कहा।

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