जब छत्तीसगढ़ में संभव..तो एमपी क्यों नहीं…वीरेन्द्र ने बताया…स्थानांतरण नहीं होने से टूट रहा शिक्षकों का परिवार

भोपाल–मध्यप्रदेश में शिक्षाकर्मियों का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। अध्यापक संघर्ष समिति के पदाधिकारी और शिक्षाकर्मियों ने प्रदेश सरकार और अधिकारियों को टारगेट पर लिया है। संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि मध्यप्रदेश में  संविदा अध्यापकों के लिए  स्थानान्तरण नीति  को बने पूरे एक साल हो गए हैं। इस बीच सरकार ने अध्यापकों का संविलियन भी कर दिया। लेकिन मजाल है कि शासन के अधिकारियों ने एक भी शिक्षाकर्मियों को  स्थानान्तरण नीति का फायदा दिया हो।
                   मध्यप्रदेश में शिक्षाकर्मियों का आक्रोश दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। अध्यापक संघर्ष समिति के नेता हीरानन्द नरवरिया ने बताया कि सरकार ने संविलियन का एलान किया। मसौदे को केबिनेट से पारित भी कर दिया गया। बावजूद इसके अभी सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। नरवरिया ने बताया कि यह सच है कि सरकार ने संविलियन का तोहफा दिया। लेकिन यह भी स्पष्ट हो चुका है कि सरकार की नीयत और नीति में भारी खोट है। संविलियन अभी भी अधूरा है।
                  अध्यापक नेता नरवरिया ने बताया कि पिछले एक साल से मध्यप्रदेश के अध्यापक स्थानान्तरण नीति पर शासन का प्रवचन सुन सुन कर तंग हो चूके है।  10 जुलाई 2017 को सरकार ने संवेदनशीलता दिखाते हुए अध्यापकों के लिए स्थानांतरण नीति बनाकर टूटे और विखरे परिवार को एक करने का तोहफा दिया। स्थानांतरण नीति को लेकर अध्यापकों में खुशी थी। ऐसे अध्यापक जो अपने घरों से मीलों दूर पदस्थ हैं। उन्हें लगा कि अब जीवन बेहतर होगा। लेकिन मजाल है कि किसी अध्यापक को स्थानांतरण नीति का फायदा मिला हो। स्थानान्तरण नीति को बने एक साल हो चुके हैं। बावजूद इसके घर और परिवार से सालों साल से दूर किसी अध्यापक को स्थानान्तरण का सुख नहीं मिला।  ऐसे लोगों का तो जीना मुश्किल हो गया है। जहां पति और पत्नी दोनों शिक्षाकर्मी हैं। लेकिन रहते मीलो दूर हैं। जिसके कारण ऐसे शिक्षक परेशान होकर मानसिक अवसाद झेल रहे है।Shikshakarmi,virendra dubey
                     मध्यप्रदेश अध्यापक संघर्ष समिति के प्रान्तीय कार्यकारी संयोजक  रमेश पाटिल ने बताया कि मध्यप्रदेश मे आनलाईन अंतरनिकाय संविलियन के नाम पर अध्यापको की भावनाओ से खिलवाड किया गया है।अध्यापको के उम्मीदो का चिराग बुझता जा रहा है। इस बीच कई परिवार तनाव के चलते विखर गए हैं। प्रशासन की तानाशाही से अध्यापको का घर वापसी का सपना बिखरता जा रहा है। लेकिन संवेदनहीन सरकार पर कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा है। सरकार की असंवेदनशीलता का सबसे बडा शिकार अध्यापक पति-पत्नि को भुगतना पड़ रहा है।
               रमेश ने बताया कि अंतरनिकाय आनलाईन (ट्रांसफर) प्रक्रिया को शुरू करने के पीछे तर्क था कि अधिकारी स्तर पर संचालित प्रक्रिया से तीव्र गति गति होगी। भ्रष्टाचार नही होगा । सुविधा शुल्क की गुंजाइश नही होगी। लेकिन हुआ सब कुछ उल्टा। अंतरनिकाय संविलियन प्रक्रिया (ट्रांसफर) कछुआ गति से आगे बढ रही है। मामले का निराकरण कब तक होगा कहना मुश्किल है।
             पाटिल ने बताया कि अंतरनिकाय संविलियन (ट्रांसफर) चाहने वालो का दर्द तब और बढ जाता है जब मीडिया में प्राथमिक,माध्यमिक शालाओ की अंतरनिकाय संविलियन प्रक्रिया (ट्रांसफर) सम्पन्न हुए बिना सहायक अध्यापको और अध्यापको के स्थानांतरण के आदेश देखते है। इससे जाहिर होता है कि सुविधा शुल्क, प्रभाव और उच्च स्तरीय पहुंच  के आधार पर स्थानांतरण का खेल जारी है। जो अध्यापक आनलाईन  अंतरनिकाय संविलियन प्रक्रिया के आधार पर आस लगाये बैठे है उनके हिस्से मे निराशा ही हाथ लगी है।
                       अध्यापक संघर्ष समिति मध्यप्रदेश ने इस मुद्दे को गंभीरता से हर मंच पर उठाया है। मीडिया ने भी पीडित अध्यापको के आन्दोलन मे सक्रिय सहयोग दिया है।
                 छत्तीसगढ़ पंचायत एवं नगरीय निकाय मोर्चा के संचालक वीरेंद्र दुबे ने बताया की शुरुआत  से ही  संविलियन के मामले में मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ से आगे था।  हम कई मंचों पर जिक्र कर चुके है कि मध्यप्रदेश में संविलियन हो सकता है तो छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं हो सकता। लेकिन मध्यप्रदेश और छत्तीशगढ़ कि संविलियन नीति में कई विषय अलग अलग है।  छत्तीसगढ़ के एक लाख तीन हजार शिक्षाकर्मियों का संविलियन हो रहा है। संविलियन  प्रक्रिया  शुरू भी हो चुकी है।
                    विरेन्द्र ने बताया कि जहां तक संविलियन में खुली स्थानान्तरण नीति का प्रावधान है। जबकि मध्यप्रदेश में ये भी स्पष्ट नही है कि सरकार अध्यापकों के  संविलियन पर ठोस और खुली स्थानांतरण नीति को गंभीरता से कब लेगी। यह जानते हुए भी कि जब छत्तीसगढ़ में खुली स्थानांतरण नीति हो सकती है तो मध्य प्रदेश में क्यो नही हो सकती।

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