शिक्षाकर्मीः स्थानांतरण नीति को लेकर घमासान…दोनों प्रदेश के नेताओं ने बताया…दोनों जगह विखर रहे परिवार

बिलासपुर—स्थानांतरण ना होने का दर्द न तो मध्यप्रदेश सरकार समझ नही रही और ना ही छत्तीसगढ़ सरकार। दोनों ही जगह परिवार बर्बाद होने की कगार पर है। स्थानांतरण पूरी तरह से अनार्थिक मुद्दा है।  लेकिन स्पष्ट नीति नहीं होने की वजह से अध्यापक “घर वापसी” नही कर पा रहे है। ऐसी बातें छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश के कमोबेश सभी शिक्षाकर्मियों की तरफ से आ रही है।
                       मध्यप्रदेश में अध्यापक संघर्ष समिति के नेता रमेश पाटिल ने बताया कि मध्यप्रदेश मे सरकार ने ही लाईन संविलियन नीति बनाई है। जिसमे ढेर सारी खामियां हैं। पति-पत्नि का एक स्थान पर समायोजन किया जाना,गंभीर बीमार, महिला स्थानांतरण आदि पर जबरन सेवाशर्ते थोपी गयी थीं। जबकि अनिवार्य स्थानांतरण और संविलियन किया जाना चाहिए था। बड़ी मुश्किल से पूरी प्रक्रिया अंतिम चरण मे पहुंची । लेकिन सरकार के ही अलग अलग विभाग ने प्रक्रिया को असंवैधानिक ठहराकर अध्यापको की कार्यमुक्ति मे अडचने पैदा कर दिया है। शिक्षा विभाग से शिक्षा विभाग मे कार्यमुक्ति के आदेश जारी हो गये हैं। लगता नही कि कार्यमुक्ति हो पाएगी। क्योकि  नये विभाग का अस्तित्व मे आना और नये कैडर का निर्माण होना…काफी विवाद में फंसता नजर आ रहा है। सवाल उठता है कि कार्यमुक्ति किस विभाग के कर्मचारी की हैसियत से होगी। क्योंकि आदेश अध्यापक संवर्ग के हिसाब से हुए है। जिस संवर्ग का अब रहना ही नही है।
                          रमेश पाटिल ने बताया कि आदिम जाति विकास विभाग ने अधिकार क्षेत्र मे कार्यरत अध्यापको के अपने और शिक्षा विभाग के क्षेत्र मे आने जाने वाले अध्यापको के संविलियन पर रोक लगा दिया है। कुल मिलाकर अपने विकासखंड और जिले मे अध्यापक संवर्ग के ढेरो पद खाली होने के बावजूद स्थानांतरण- संविलियन प्रक्रिया सम्पन्न नही हो पायी है। यही स्थिति अभी हाईस्कूल और हायर सेकंडरी शालाओ की है। प्राथमिक, माध्यमिक शाला मे कार्यरत अध्यापको की वेरिफिकेशन प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। उनकी संविलियन प्रक्रिया निकट भविष्य मे हो पायेगी लगता नही है।
                रमेश के अनुसार अध्यापक संवर्ग के स्थानांतरण  उत्पीडित सदस्यो को शक है कि स्थानांतरण की आनलाईन संविलियन प्रक्रिया होने से मंत्री-संत्री, अधिकारी “सेवा शुल्क” से वंचित हो गये है इसलिए सबका ही प्रयास यही है कि आनलाईन संविलियन प्रक्रिया निरस्त हो जाए और आॅफलाईन प्रक्रिया के माध्यम से कुछ “सुविधा शुल्क” की गुंजाईश बने।जो सच भी प्रतीत हो रही है क्योंकि संविलियन प्रक्रिया अपनी पूर्व घोषित समय सारणी के अनुसार सम्पन्न नही हुई।*
                रमेश ने बताया स्थानांतरण संवेदनशील मुद्दा है। सरकार से मामले में संवेदनशीलता की अपेक्षा थी। लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिला। स्थानांतरण नहीं होने से सेवारत पति-पत्नि मे  तलाक और तनाव की स्थिति है। बच्चो के परवरिश, सुरक्षा का गंभीर संकट पैदा हो गया है। परिवार मे हमेशा तनावपूर्ण स्थिति बनी रहती है। बावजूद इसके सरकार कहीं से भी संवेदनशील नहीं है। अनार्थिक मुद्दो पर बंधनरहीत स्थानांतरण  जैसा फैसला सरकार नही ले पाई तो आर्थिक मुद्दो पर शोषण से मुक्त करेगी लगता नही है। भौगोलिक दृष्टि से मध्यप्रदेश बहुत बडा राज्य है। गृह जिले से दूर जिलो मे कार्यरत अध्यापको के लिए स्थानांतरण बहुत गंभीर समस्या है।
                   कमोबेश कुछ ऐसा ही मानना विकास सिंह राजपूत की भी है। छत्तीसगढ़ शिक्षाकर्मी संयुक्त मोर्चा के नेता विकास ने बताया कि मध्यप्रदेश में शिक्षाकर्मी अध्यापकों का स्थानांतरण की जो समस्या है। कुछ ऐसी ही समस्या छत्तीसगढ़ में भी है। कम से कम मध्यप्रदेश में तो वेब पोर्टल बनाकर स्थानांतरण हुए हैं। जबकि छत्तीसगढ़ में शिक्षाकर्मियों का स्थानांतरण की सोच भी रखना पाप है। सरकार भी मौन है। ऐसा लगता है कि सरकार में बैठे लोग बिना परिवार के हैं। शायद यही कारण है कि उन्हें शिक्षाकर्मियों की परेशानी को लेकर कोई चिंता नहीं है। पहले भी कठिन नियमों पर स्थानांतरण हुए हैं। लेकिन इसके लिए शिक्षाकर्मियों को बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं। सच्चाई तो यह है कि स्थानांतरण नीति को लेकर जो हालात मध्यप्रदेश के हैं उससे कहीं ज्यादा बदतर स्थिति छत्तीसगढ़ के शिक्षाकर्मियों की है। उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ सरकार संविलियन समेत शिक्षकों की खुली स्थानांतरण नीति पर ठोस निर्णय लेगी।

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