साहेब जी !! अभी तो मेंहदी सूख भी नहीं पाई और गैंती चल गई..बिलासपुर में बेकसूर को सजा..और अपराधियों के लिए कोई “लालबत्ती” तक नहीं

( गिरिजेय )पहला सीन-जगह का नाम है….मंगला चौक…..तेजी से विकास कर रहे शहर में काफी भीड-भाड़ वाला इलाका…..। चौराहा काफी पुराना है…..बस भीड़ ही बढ़ गई है….। जहां से रोजाना रोजी – मजूरी करने वाले हजारों मजदूर भी गुजरते हैं…. जो मुंगेली रोड के ईर्द – गिर्द बसे दूर तक के गाँवों से रोज आते हैं …..  और रोज वापस भी लौटते हैं … अपनी सायकल पर …..।… स्कूल – कॉलेज के बच्चों से लेकर दफ्तर में काम करने वाले बाबू – साहब,  कामगार, व्यापारी – कारोबारी …. और कलेक्टोरेट का चक्कर लगाने गाँव से शहर आ रहे आम आदमी की मोटरसायकल भी गुजरती है…….. । बड़ी – बड़ी कॉलोनियों में रहने वालों की चमचमाती – लम्बी कारें भी इस चौराहे से होकर गुजरती हैं…..। कभी – कभी सॉयरन बजाती एँबुलेंस निकलती है …. तो कभी – कभी नेताओँ का काफिला भी निकलता है…. यानी इस चौराहे से समाज के सभी तबके का वास्ता है…..। जिनका संगम ऐसे चौराहे पर होता है …. जिसका दिल तो बहुत बड़ा लगता है मगर जगह बहुत ही सकरी है…..। ऊपर से ठीक चौक पर शहर का “परंपरागत गढ्ढा ” खोदे जाने के बाद जिस तरह उसे पाटा गया है , उससे वहां सड़क नाम की चीज तो कहीं नहीं दिखेगी … खेत किनारे का “ धरसा ” जरूर नजर आ जाएगा।
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जिस पर से गुजरना ही अगर अपराध है , तो काफी सारे लोग रोज यह अपराध करते हैं। इस मजबूरी में…. कि जिस तरह जीने के लिए हवा – पानी जरूरी है, वैसे ही जीने के लिए घर से बाहर निकलना भी जरूरी है।  जिस पर लगाम के लिए चौराहे पर “ लाल बत्ती ” लगी हुई है…….। एक –एक सेकेन्ड की गिनती कराते हुए … मुस्तैद ….. ठीक समय पर जलती …… और ठीक समय पर बुझती है…..। बत्ती का अनदेखा करने वालों पर कैमरे भी नजर रखे हुए हैं……। यानी ट्रैफिक का बढ़िया इंतजाम …. पूरा नियम…… पूरा पालन ……। सड़क पर चलने वालों के लिए……।



अब दूसरा सीन….
मंगला चौक से थोड़ा आगे बढ़िए….. मुंगेली रोड की ओर ……। सड़क किनारे कुछ बेरीकेट्स लगे हैं…..। कुछ लोग एक जेसीबी मशीन से सड़क खोद रहे है…..। गढ्ढा उथला नहीं …. गहरा है। वैसे सड़क पर गढ्ढा देखना तो यहां के लोगों के रोज का काम है…. लेकिन यह गढ्ढा कुछ अलग है….। पास जाने पर दिखेगा कि यहां हफ्ते भर भी नहीं हुए हैं सड़क को बने हुए …….। खुदाई के बाद बाहर आए गिट्टी के टुकड़ों पर लिपटी डामर भी अभी नहीं सूखी है…….। ताजगी झलक रही है…..। …. कोई कह सकता है कि अभी मेंहदी भी सूख नहीं पाई और कुदाल – गैंती चल गई….।सड़क जैसे – तैसे बन पाई थी और उधड़ भी गई……। सड़क पर आगे बढ़िए…… उस्लापुर ब्रिज पहुंचते –पहुंचते आप देख लेंगे कि सड़क किनारे इस तरह कई जगह पर हफ्ते भर के भीतर सड़क खोदी गई है। आम आदमी तो इस बात की फिकर करने लगता है कि अब सड़क किनारे का यह गढ्ढा सड़क पर से गुजरने वालों को तब तक “ उचकाता ” रहेगा, जब तक कि दोबारा फिर नई सड़क नहीं बन जाती….। तजुर्बा तो यही कहता है कि जहाँ कहीं मेनहोल का ढक्कन सड़क पर उठा हुआ है….. कहीं ऊबड़ – खाबड़ है… कहीं बैरीकेट लगे हैं….. कहीं कोई गढ्ढा है…. तो खुदी हुई सड़क में खुद को किसी तरह बचाकर , जहां रास्ता मिले …. बस निकल लो….सड़क पर से गुजरना अपना अपराध मानकर….।



लेकिन क्या बिलासपुर शहर में इस तरह खुली सड़क पर हर रोज हो रहे इस अपराध को देखने वाला कोई  नहीं है। क्या इस तरह हमारी ही सड़क खोद….. उसकी धूल हमारी ही आँखों में झोंककर हमारे ही पैसे का मजाक उड़ा रहे लोगों पर लगाम लगाने के लिए कोई “ लालबत्ती ” सड़क पर क्यों नहीं दिखती….? क्या घर से निकलने और सड़क पर चलने का अपराध कर रहे लोगों के क्राइम से यह क्राइम छोटा मान लिया गया है , जो सड़क पर दिन –दहाड़े गुजर रहे लोगों के सामने……. बनाने – खोदने – फिर बनाने… फिर खोदने के खेल में सरकारी खजाना लुटा रहे हैं….।रोड पर चलने वालों के लिए सब नियम हैं….. और उसी रोड के साथ रोजाना खुले-आम बलात-कर्म कर रहे व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों के लिए कोई नियम – कानून नहीं है..? क्या यह मान लिया जाए कि अगर शहर का ट्रेफिक ठीक नहीं है तो सड़क पर चलने वाला ही जिम्मेदार है, और किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं है….? यह सभी मानते हैं कि शहर की तरक्की के लिए फंड की कोई कमी नहीं है। मगर फंड का इस्तेमाल अगर …  “ माल – ए – मुफ्त.. दिले – ए – बेरहम की तर्ज पर हो रहा है तो कहना पडेगा कि … साहेब जी, उनके लिए भी कोई “लाल बत्ती ” खोजिए जो जनता के पैसे का बेदर्दी से धुर्रा उड़ा रहे हैं……।



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