कांग्रेस को मिल गए दो केन्डीडेट,बिलासपुर में मजबूत हुई पार्टी…?

index_zarura_images_julyइश्क का जौक–ए-नजारा मुफ्त में बदनाम है,
हुश्न खुद बेताब है,जलवे दिखाने के लिए !!
मशहूर शायर मजाज लखनवी साहब की ये लाइने यकीनन हुस्न- ओ- इश्क की दुनिया को लेकर लिखी गईं हैं। लेकिन बिलासपुर शहर में कांग्रेस की राजनीति में उम्मीदवारों की दावेदारी  को लेकर जो कुछ चल रहा है, उसके पेशे नजर इश्क-ए-सियासत में भी ये लाइनें फिट नजर आती हैं..।चूंकि यहां भी गोया  फिर वहीं चीज सियासत के हिस्से में आती हुई दिखाई दे  रही है ,जिसके लिए पिछले कई चुनावों से वह बदनामी मोल लेती रही है।इश्क का जौक ए नजारा ( देखने की ख्वाहिश ) सबकी नजर में है। जबकि इश्क ए सियासत के स्टेज पर हुश्न वाले खुद अपना जलवा दिखाने को बेताब नजर आ रहे हैं। तभी तो बिलासपुर शहर में कांग्रेस को एक केन्डीडेट की जरूरत के एवज में वक्त ने दो- दो उम्मीदवार दे दिए हैं।इस मायने में कांग्रेस पहले के मुकाबले मजबूत मानी जा सकती है।
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                                              पिछले लगातार चार चुनावों से विधानसभा में बिलासपुर की नुमाइंदगी कर रहे अमर अग्रवाल को शिकस्त देने के लिए कांग्रेस को पिछले काफी समय से एक अदद–दमदार केन्डीडेट की तलाश तो है..।अमर अग्रवाल ने  जिस तरह से शहर में बी.आर.यादव के सिलसिले को तोड़कर अपना सिलसिला शुरू किया , अब उस सिलसिले को तोड़ने के लिए कांग्रेस एक कद्दावर चेहरे की तलाश कर रही है..।शहर की सियासत कुछ ऐसी हो गई है कि बीजेपी के स्टेज पर एक से लेकर सौ तक सिर्फ और सिर्फ अमर अग्रवाल का चेहरा नजर आता है…।इधर कांग्रेस में चेहरे बदलते जा रहे हैं।

                                             यह भी गजब इत्तफाक है कि  बिलासपुर की सीट पर दो बार कांग्रेस का पँजा निशान लेकर मैदान में उतरे अनिल टाह और पिछले चुनाव की उम्मीदवार श्रीमती वाणी राव अब जोगी कांग्रेस में हैं…। ऐसे में यह तय है कि कांग्रेस की तरफ से कोई नया चेहरा सामने आएगा…। यह चेहरा किसका होगा , यह भी लोग जानना चाह रहे हैं। खासकर शहर के मौजूदा हालात को देखते हुए कुछ नया करने का जज्बा जब भी परवान चढ़ता है, नए चेहरे को देख लेने की बेचैनी आम लोगों में  और भी बढ़ जाती है।

                                            मौसम के बदलते तेवर के बीच आसमान पर बादल अभी भी छाए हुए हैं और बरसने की उम्मीद में बेचैनी बनी हुई है। यूँ तो कांग्रेस का रिकार्ड बताता है कि चेहरा तब तक फाइनल नहीं हो जाता , जब तक बी फार्म न जमा हो जाए। लेकिन आसमान से बदली इतनी तो छँट ही गई है कि आने वाले चुनावी मौसम को समझने के लिए चेहरे देखे जा सकते  हैं। जिसमें यह तो दिखने लगा है कि कहां तो कांग्रेस को एक चेहरे की जरूरत थी वहां अब एक नहीं – दो चेहरे दिखने लगे हैं।

                                       पार्टी में भावी उम्मीदवार के रूप में पिछले काफी समय से सक्रिय प्रदेश महामंत्री अटल श्रीवास्तव के बराबर अब सीवीआरयू के  पूर्व  रिजस्ट्रार शैलेष पाण्डेय का भी चेहरा उभर कर सामने आ गया है। यह भी अजब इत्तफाक है कि दोनों चेहरे इन दिनों सुर्खियों में हैं। अटल श्रीवास्तव का नाम पहले नसबंदी कांड के आरोपी की कन्ट्री क्लब से गिरफ्तारी और अब  जमीन की हेराफेरी की वजह से मीडिया में जगह पा रहा है। वहीं शैलेष पाण्डेय कांग्रेस में दाखिल होने की वजह से चर्चा में हैं। पिछले कोई पखवाड़े भर के घटना क्रम ने दोनों को बड़ा नेता बना दिया है।

                                      कांग्रेस इन दोनों में से किस चेहरे को सामने लाएगी , यह उसका अपना अंदरूनी मामला है। इसमें न तो अमर अग्रवाल कुछ कर सकते और ना बीजेपी कुछ कर सकती है। लेकिन कांग्रेस के दोनों चेहरे अमर अग्रवाल को अपना दुश्मन   नंबर एक मानकर चल रहे हैं। एक के हिसाब से बिलासपुर शहर के कार्यक्रमों में सक्रियता की वजह से अमर अग्रवाल से अदावत हुई। तो दूसरे के साथ वालों  की दलील हो सकती है कि मजबूत उम्मीदवार के रूप में उभरने की वजह से भूपेश बघेल की तरह नसबंदी कांड और  जमीन के मामले में फँसाने की साजिश चल रही है।  और   दावेदारों को अभी से निपटाने का खेल शुरू कर दिया गया है। सच्चाई तो हमेशा की तरह अपने वक्त पर ही सामने आएगी।लेकिन हाल–फिलहाल हुश्न का जलवा दिखाने के इस होड़ में एक त्रिकोण जरूर बन गया है। जिसके एक कोण पर तो अमर अग्रवाल हैं।

                                   वहीं दूसरे  और तीसरे कोण पर कांग्रेस के दोनों दावेदार  अपनी  पोजीशन लेते हुए नजर आ रहे हैं।    जिससे गेंद फिर अमर अग्रवाल के पाले की ओर खिसकती दिखाई दे रही  है। जो सही वक्त देखकर गेंद किसी की तरफ भी उछाल सकेंगे और उन्हे इस तरह गेंद उछालने के लिए  अब तक हर बार अपने माफिक मैदान मिलता रहा है। लोग नहीं भूले हैं कि अमर अग्रवाल के  1998 के पहले चुनाव में बी आर यादव के पुत्र राजू यादव कांग्रेस के उम्मीदवार बनाए गए थे। तब कांग्रेस के ही अनिल टाह ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरकर कांग्रेस की उम्मीदों पर इँजन चला दिया था। 2003 में तब के मुख्यमंत्री अजीत जोगी  के केन्डीडेट के रूप में अनिल टाह   कांग्रेस की तरफ से मैदान में उतरे । तब एनसीपी से बी आर यादव और सपा से अशोक अग्रवाल भी मैदान में आ गए थे । फिर तो कांग्रेस में ऐसा बिखराव हुआ कि पार्टी और केन्डीडेट अलग – अलग नजर आने की वजह से कांग्रेस  को 2008 और 2013 में भी  शिकस्त खानी पड़ी।

                                               कुल मिलाकर  पिछले चार चुनाव सरल गणित +बीज गणित + रेखा गणित के मिक्सचर की तरह भले ही नजर आते हों।लेकिन हर बार कांग्रेस का बिखराव कॉमन फैक्टर की तरह  नजर आता है। हर बार प्लस–माइनस के साथ एक त्रिकोण भी दिखाई देता रहा। जिसमें एक कोने में  बीजेपी तो दूसरी तरफ कांग्रेस के लोग दो कोने में बंटे हुए दिखाई देते रहे हैं। इस बार भी अलग–अलग बिंदुओँ के बीच रेखाएँ खींचने की शुरूआत समझ में आने लगी है।इसका मतलब तो शायद यही है कि–इधऱ  हुश्न  के मालिक  तो  खुद ही जलवा दिखाने के लिए बेताब हो रहे हैं और उधर इश्क- ए- सियासत के नजारे पर अपनी नजरें गड़ाए तीसरा कोण सही वक्त  के इँतजार में है..?

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