रंगों के संगम में..जो डूबा सो पार..

fesature_shlay(रुद्र अवस्थी)ठाकुर- अभी तक दिल नहीं भरा होली से ?जया भादुड़ी-ये…ठाकुर चाचा……होली रंगो का त्यौहार है…….लाल, पीले, नीले, हरे…कैसे दिल भरेगा इन रंगो से….जरा आप ही सोचिए- अगर ये रंग न हों तो कैसे बेरंग लगेगी ये दुनिया?यह डॉयलाग शोले का है।हिंदुस्तानी सिनेमा में सबसे अधिक आम जन-जीवन के संवादों में अपना असर डालने वाली फिल्म शोले में होली का यह सीन भी है।आम तौर पर लोग-बाग होली के समय खास तौर पर दो सीन को ही याद करते हैं। अव्वल तो गब्बर का डॉयलाग- होली कब है?कब है होली?सोशल मीडिया के आने के बाद तो यह सीन खूब वायरल होता रहा है। दूसरा इस फिल्म में–”होली के दिन दिल खिल जाते हैं…रंगों में रंग मिल जाते हैं…”य़ह गाना आज भी जब बजता है तो होरियारों को पचहत्तर के दिन याद आ जाते हैं। लेकिन गब्बर के डॉयलाग और इस रंगीन गीत के मुकाबले जया भादुड़ी का यह संवाद कम ही याद किया जाता है।

                          सहेलियों के साथ होली खेलने की इजाजत माँगते हुए जया भादुड़ी की कही बातें दरअसल होली के फलसफाना चेहरे की ओर भी देखने के लिए इशारा करती है। यह शोले की नए सिरे से समीक्षा की कोशिश नहीं है। मगर इस फिल्म और होली को जिंदगी के रंगों की नजर से देखने की कोशिश जरूर है। चूंकि  जया  की होली का यह सीन जिदगी के रंगों की ओर भी मुखातिब होने का न्यौता तो दे ही गया है। बात सच लगती भी है – भला रंगों से किसका मन भर सकता है…।

                       back2सतरंगी रंगों से भरा यह त्यौहार हर साल जिंदगी के दरवाजे पर दस्तक देकर उत्सव, उल्लास, उमंग का अहसास करा जाता है। जैसे दिवाली जिंदगी में रौशनी और दशहरा – “असत्य पर सत्य की जीत” का अहसास करा जाते हैं। होली का त्यौहार- फाग की स्वर-लहरियों की गूँज.रंगों की खूबसूरती, अलग-अलग रहकर भी एक साथ खुशी लुटाने की सीख-,   प्रेम , मस्ती, रंग-तरंग सब कुछ लेकर आता है। यह ऐसा संगम है, जो खुद चलकर हमारे पास आ जाता है और “खुसरो के प्रेम के दरिया”की तरह होली के इस गहरे संगम में जो डूबा वही पार हो सकता है। मीरा की तरह अमर-डूबान…….। रंग में डूबे बिना कोई भी उसके रंग में भला कैसे रंग सकता है।

                                                     शोले फिल्म में किशोरपन की मासूमियत भरे – रंगों से रंगे जया भादुड़ी के इस सवाल में भी जिंदगी के backgroundकई सवालों का जवाब एक ही जगह मिल सकता है। जिसमें वह पूछती है कि- “जरा सोचिए…अगर ये रंग ना हों तो कैसे बेरंग लगेगी यह दुनिया”?रंगों के बिना सचमुच न तो इस दुनिया की कल्पना की जा सकती है…और ना ही रंगों के बिना जिंदगी की कोई पहचान हो सकती है…। सुख, प्रेम, आनंद, स्नेह, सद्भावना , भरोसा,  उमंग-उत्साह जैसे चमकदार रंग जब जिंदगी के पोस्टर पर आगे आकर उभर जाते हैं,, तो दुख,घृणा, बुराई, घमंड जैसे रंग पीछे छिप जाते हैं। खुशी के इन रंगों के आगे किसी और रंग की कोई ठौर नहीं। जिंदगी का गुलस्ता भी कुछ ऐसे ही अलग-अलग रंगों से मिलकर गुलजार हो सकता है। एक ही रंग की बनिस्बत अलग-अलग किस्मों और रंगों से भरा गुलदस्ता अधिक मोहक नजर आता है। ऐसे में जीवन-तन-मन-बदन पर विविध रंगों की बौछार करने वाले रंग महापर्व होली से भला किसका मन भर सकता है। बेरंग दुनिया की भयावह कल्पना से दूर किसम- किसम के रंगों की तरफ सभी को खींच लेने की मनुहार के साथ प्रकृति भी अपने रंग में है। कभी हरियाली तो कभी पलाश की लाली…..। सावन में मोर का नृत्य और बसंत में कोयल की कुहुक…..। कहीं उधार की हरियाली देख मोर की तरह  नाच रहा मन….। तो कहीं पत्तों से उजड़ चुकी डालियों पर उगती नई कोपलों के बीच बैठकर नए सृजन के गीत गाता कोयल सा मन…..।

                                  IMG_2941कुदरत की होली के रंग भी कितने मोहक- सुहाने हैं…। कुदरत का खूबसूरत-नायाब तोहफा है…होली। गौर फरमाने की बात यह भी है कि होलिका दहन के बाद “खाक की राख” पर फाग की मस्ती में नाचकर रंगों का यह त्यौहार मनाया जाता है।यह समापन के बाद शुभारंभ…अंत के बाद आरंभ…खात्मे के बाद नई शुरूआत…पुराने पत्तों के झरने के बाद नई कोपलों के चटकने…खालीपन के बाद-“वैक्यूम “को फिर से भरने की कवायद…सब कुछ है। इतना कुछ है कि हर कोई अपनी-अपनी अंजुरी में अपने-अपने हिस्से का उत्सव , जोश ,उमंग –उल्लास भर लेना चाहता है।ताकि आने वाले बसंत तक अपनी हथेली खाली न रह जाए……। फिर भला मन कैसे भरेगा होली से…? सभी को मिले अपनी-अपनी ख्वाहिशों के रंग…।सीजीवाल परिवार की ओर से स्वीकार कीजिए शुभकामनाओँ – दुआओँ के रंग…।

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