सीएम का नेटवर्क

FB_IMG_1441516484068संजय दीक्षित। लंबे समय तक सीएम होने का अपना मतलब होता है। इसे पिछले हफ्ते आईपीएस अफसरों ने महसूस किया। दरअसल, बस्तर में तीन नक्सलियों का एनकाउंटर हुआ था। पीएचक्यू में खुफिया चीफ अशोक जुनेजा, बस्तर के आईजी एसआरपी कल्लुरी, सीआरपीएफ आईजी समेत कई आला अधिकारी अगले दिन ठीक-ठाक तरीके से प्रेस कांफे्रंस कर एनकाउंटर का खुलासा करने की रणनीति बना रहे थे। इसी दौरान सीएम का दिल्ली से फोन आ गया। वे दो दिन के दिल्ली विजिट पर थे। उन्होंने पूछा, बस्तर में एनकाउंटर हुआ है? पुलिस अफसर इस सवाल पर हैरान रह गए, सीएम दिल्ली में हैं, उन्हें कैसे पता चल गया। इसके बाद आनन-फानन में पुलिस को प्रेस कांफें्रस करना पड़ा।

मंत्री की गाली
गाली बकने एवं हड़काने में एक्सपर्ट माने जाने वाले एक मंत्रीजी का व्हाट्सअप इन दिनों चर्चा में है। बताते हैं, मंत्रीजी अपने बंगले में किसी नेता को गरिया रहे थे। उनका वायस किसी ने मोबाइल में रिकार्ड कर लिया। इसके बाद उसे वायरल होने में देर नहीं लगी। मंत्री विरोधियों ने ढूंढ-ढूंढकर व्हाट्सअप ग्रुपों में आडियो को सेंड कर दिया। अब, मंत्री के समर्थक सफाई दे रहे हैं, मंत्रीजी रोड बनाने के लिए पेड़ उखाड़ने की बात कह रहे हैं। लोग, नाहक इसका गलत अर्थ ना निकालें।

48 करोड़ का चूना

        राजधानी का वीआईपी रोड बोले तो एयरपोर्ट रोड। इस रोड का एक बार फिर चैड़ीकरण की कवायद शुरू हो गई है। इसके लिए 76 करोड़ का प्रोजेक्ट तैयार किया है। 106 फुट में से 60 फुट का फोर लेन सिर्फ एयरपोर्ट के लिए होगा। जीई रोड से आप इंटर किए तो सीधे एयरपोर्ट के पास निकलेंगे। बीच में कोई कट नहीं। बाकियों के लिए इस रोड के दोनों ओर 23-23 फुट की सड़क होगी। मगर प्रश्न यह है कि जब वीआईपी रोड को चैड़ा करना ही था, तो दो साल पहले व्हाया धरमपुरा नया एयरपोर्ट रोड बनाया ही क्यों गया। आप जरा याद कीजिए। 2013 में वीआईपी रोड के चैड़ीकरण का जमकर विरोध हुआ था। तब पीडब्लूडी ने पैंतरा बदलते हुए सरकार के सामने धरमपुरा होकर एयरपोर्ट रोड बनाने का प्रस्ताव रख दिया था। हालांकि, इसमें एयरपोर्ट का डिस्टेंस तीन किलोमीटर अधिक था। मगर वीआईपी रोड के विवाद को देखते सरकार ने इसे मंजूरी देने में देर नहीं लगाई। नई फोरलेन सड़क बनाने में करीब 48 करोड़ खर्च आया। मगर इस रोड की युटीलिटी देखिए। एक आदमी इस रोड से एयरपोर्ट नहीं जाता। अलबत्ता, जो अफसर नया एयरपोर्ट बनाए, वे भी वीआईपी रोड से ही एयरपोर्ट आना-जाना करते हैं। फायदा हुआ तो सिर्फ दो को। एक, आसपास के गावों के मवेशियों को धूमने, फिरने और आराम से पगुराने के लिए साफ-सुथरी जगह मिल गई। और दूसरा, धरमपुरा में रहने वाले नौकरशाहों की कालोनी को। हाउसिंग बोर्ड ने तीन साल पहले 100 रुपए में उन्हें जमीनें दी थी, रोड बनने के बाद अब वह 800 रुपए पर पहुंच गया है। हाउसिंग बोर्ड ने इसलिए सस्ते में जमीनें दी थी कि वहां रोड नहीं है। और, पीडब्लूडी ने वहां दो साल के भीतर चकाचक फोर लेन बना दिया। अब, हम ये नहीं कहेंगे कि पीडब्लूडी ने एयरपोर्ट की आड़ में धरमपुरा कालोनी के लिए रोड बना दिया। मगर सरकार को देखना चाहिए। और, इसके पीछे के खेल को समझना भी चाहिए। कि ठीक उसकी नाक के नीचे क्या हो रहा है।

नामों में क्या

       वीआईपी रोड का नया नाम अब एयरपोर्ट हाइवे होगा। सरकार ने इस पर मुहर लगा दिया है। हालांकि, नामों में कुछ रखा नहीं है। मगर इसका विरोध होना तय है। कारण कि वीआईपी रोड का नाम राजीव गांधी रोड पहले ही रखा जा चुका है। और, इसे और कोई नहीं, बल्कि सरकार ने ही बताया था। दिवंगत सीएम श्यामाचरण शुक्ल की बेटी ने जब दो साल पहले वीआईपी रोड का नामकरण उनके पिता के नाम पर करने की मांग की थी, तो सरकार ने उसे यह कहते हुए विनम्रता से ठुकरा दिया था कि इस रोड का नामकरण तो राजीव गांधी के नाम पर पहले ही हो चुका है। ऐसे में, नगरीय प्रशासन विभाग ने अगर वीआईपी रोड का नाम बदल दिया है, तो जाहिर है कांग्रेस इस पर सवाल खड़ा करेगी।

आईजी के नम्बर

       सूबे के सबसे बड़े दो जिलों में कांग्रेस ने दो मेगा शो किया। दोनों ही अमित जोगी का था। अमित जोगी के होने का मतलब आप समझ सकते हैं। शक्ति प्रदर्शन। रायपुर के आक्रोश रैली में यूथ कांग्रेस के प्रेसिडेंट राजा बराड़ आए। बराड़ जिस प्रदर्शन में शामिल होते हैं, वहां लाठी चार्ज से कम में बात बनती नहीं। रायपुर में उनके पोस्टर लगे ही थे, जिनमें उनके हाथ से लहू निकलते दिखाया गया था। गड़बड़ी की आशंका के इंटेलिजेंस नोट भी थे। मगर पुलिस ने ऐसी मुकम्मल इंतजामात किए कि लाठी पटकने की भी जरूरत नहीं पड़ी। इसके ठीक अगले रोज बिल्हा में युकां नेता की लाश रखकर चक्का जाम किया जाना था। इलेक्ट्रानिक मीडिया में जिस तरह से ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी, लगा मानों बिलासपुर में आग लग जाएगी। मगर बिलासपुर पुलिस और प्रशासन ने पानी फेर दिया। बिल्हा विधायक के कान में पुलिस वालों ने कुछ कह दिया। इसके बाद नेताजी सामने ही नहीं आए। बिना किसी अप्रिय स्थिति के दोनों मेगा शो निबट गए। ऐसे में, दोनों रेंज के आईजी का नम्बर बढ़ना लाजिमी है। सीएम ने भी दोनों को एप्रीसियेट किया है।

बीरगांव के मायने

         बीरगांव नगर निगम चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के ताकत झोंक देने के अपने मतलब हंै। पिछले साल ही हुए लोकल इलेक्शन में कांग्रेस ने सत्ताधारी पार्टी को जोर का झटका दिया था। जाहिर है, इस चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस को जोश से लबरेज कर दिया। कांग्रेस आलाकमान का भी संगठन के नेताओं के प्रति विश्वास बढ़ा। लिहाजा, भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस और आक्रमक हो गई। अब, बीरगांव के नतीजे भी अगर कांग्रेस के खाते में जाते हैं तो सताधारी पार्टी की मुश्किलें और बढ़ेगी। कांग्रेस पार्टी मैसेज देने की कोशिश करेगी कि बीजेपी का अब डाउनफाल शुरू हो गया है। और, सत्ताधारी पार्टी अगर बीरगांव को फतह करने में कामयाब हुई तो कांग्रेस का कांफिडेंस लड़खड़ाएगा। इसके ठीक उलट बीजेपी का आत्मविश्वास बढ़ेगा। दूसरा, कांग्रेस पार्टी में विरोध के स्वर और मुखर होंगे। वजह? बीरगांव नगरपालिका में कांग्रेस कभी हारी नहीं है। सो, विरोधी खेमा हार का ठीकरा संगठन के नेताओं पर फोडने की कोशिश करेगा। ऐसे में, दोनों ही पार्टियों के लिए इस चुनाव की अहमियत आप समझ सकते हैं।

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