21वीं सदी में आदिम युग जीवन जीने को मजबूर धनुहार

Pendra- Dhanuhaar (1)0जंगल के भीतर जानवर और मूलभूत सुविधाओं तक से जूझ रहे हैं

0अंतिम छोर के लोग, तीन किलोमीटर पानी के लिये तो 7 किलोमीटर राशन के लिये जाना पड़ता है

पेंड्रा(शरद अग्रवाल)।वो इंसान है, जानवरों से जूझकर अपनी जिंदगी तो किसी तरह बचा पा रहे है पर जिन्दगी जीने के लिये बुनियादी सुविधाओं के लिये इतनी जददोजहद करनी पड़ रही है कि शायद अब उस बस्ती का हर इक बशिंदा यही फरियाद रहा है कि अगले जनम हमें इन्सान मत बनाना और बनाना भी तो कम से कम इस बस्ती में दुबारा मत जीने को भेजना।हम बात कर रहे हैं आज उस एक नाम मरवाही की जिसकी चर्चा राज्य के राजनैतिक गलियारों में जोगी परिवार के कारण सुर्खियों का विषय रहती है। मरवाही से 20 किलोमीटर दूरी पर स्थित मटियाडांड़ गांव के धनुहार आज भी आदिम युग में जीवन जीने को मजबूर है जहां मूलभूत सुविधांए तक नहीं पहुंच रही।

                                Pendra- Dhanuhaar (2)चकमक पत्थर से आग जलाना, तीर धनुश से शिकार और बांस से सामान बनाकर बेचकर जीवन यापन करने वाले धनुहारों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। मरवाही मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर मटियाडांड़ का आश्रित ग्राम अखराडांड़ को धनुहारों की बस्ती के कारण धनुहारपारा भी कहा जाता है जहां 150 धनुहार परिवार के सदस्य निवास करते हैं। हम जहां वैज्ञानिक युग में आधुनिकतम संचार साधनों का उपयोग और सुख सुविधाओं का उपभोग करते हैं वहीं अखराडांड़ के ये धनुहार आज भी आदिम युग में जी रहे हैं। सरकार को इनकी सुध आती है तो सिर्फ चुनाव के दौरान क्योकि इनके वोट जो चाहिये होते हैं। अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक विकास का दावा करने वाली सरकार आज तक यहां बिजली मुहैया नहीं करा सकी है और तो और पीने के लिये पानी का एक बोर तक नहीं कराया गया है।

                            Pendra- Dhanuhaarऐसा नहीं है कि बिजली बहुत दूर हो बिजली सिर्फ दो किलोमीटर दूर बहरीझोरखी तक पहुंची हुयी है पर दो किलोमीटर दूर इस बस्ती तक बिजली पहुंचाना सरकार का लक्ष्य है ऐसा इस बस्ती के हालात को देखकर जरा भी नहीं कहा जा सकता। राशन लेने के लिये इन गरीबों को 7 किलोमीटर का घना जंगल पार करके मटियाडांड़ जाना पड़ता है और आए दिन इनका जंगली जानवरों से मुकाबला होते रहता है आलम यह है कि पानी लेने के लिये डेढ़ किलोमीटर दूर डयोढ़ी जाते समय महिला पानी उठाती है तो पुरूश तीर धनुश रखकर उनकी सुरक्षा के लिये आगे पीछे चलते हैं। और यदि डयोढ़ी में पानी नहीं है तो ये लोग सात किलोमीटर दूर कोरबा जिले के पसान तहसील क्षेत्र की सीमा में बहती हुयी सुखाड़ नदी से भी कई बार पानी लाना पड़ता है।

Pendra- Dhanuhaar (3)इस गांव के किसी भी व्यक्ति की अधिकतम पढाई पांचवी की है जबकि हाल ही में एक बहू आई जो कि सबसे ज्यादा आठवी तक पढ़ी है गांव में चुनाव के समय आंगनबाड़ी फुलवारी का संचालन शुरू किया गया पर पिछले साल से वह भी बंद है। निकटतम स्कूल 5 किलोमीटर दूर है और जंगल का रास्ता होने के कारण बच्चे जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को प्राथमिकता नहीं देते। ये लोग परिवार नियोजन नहीं कराते न ही इन तक कोई सरकारी स्वास्थ्य सुविधांए कभी पहुंचती है लिहाजा जन्म और मृत्यु का सिलसिला भी लगातार जारी है। पर न तो इनके जन्म से कोई सरोकार होता और न ही सरकार को कोई फर्क आज तक पड़ता दिखाई दिया है। जंगली जानवरों से मुकाबले में घायल होने पर मुआवजा मिलना बहुत कम लोगों को नसीब हो सका है।

                           राशन खत्म होने पर कंदमूल और जंगली जानवरों का षिकार करके भूख मिटाते हैं। अखराडांड़ के ये धनुहार कई दफा स्थानीय जनप्रतिनिधियों के जरिये सरकार के पास लाईट और पानी की जरूरत से अवगत कराये पर कोई सुनता ही नहीं लिहाजा अब सरकारी सिस्टम से इनका भरोसा उठ सा गया है। न तो इन्होने विधायक को अपनी बस्ती में कभी देखा है न ही सांसद को। वहीं इनके विकास की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों पर है वे भी अपने कार्यालयों में बैठकर विकास के नाम पर खानापूर्ति करने के सिवाय आज तक कुछ नहीं किये हैं। पूछने पर ये भोले भाले धनुहार अपनी जरूरतों को ये बड़ी उम्मीदों से बतलाते हैं जबकि जनप्रतिनिधि एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर कर्तव्यों से किनारा करते नजर आते हैं। देखना यह है कि आखिर कब अखराडांड़ तक विकास की रौशनी पहुंचती है। पिछली तीन पीढ़ी से इनको याद है कि ये यहां पर रह रहे हैं पर इतने वर्शों में भी आज तक विकास से वंचित होना इनकी बदनसीबी को बतलाता तो है ही सरकार के वादों और दावों की भी पोल खोलकर रख देता है।

बाॅक्स मैटरः- वे कहते हैंः-
बिसाहन धनुहार, स्थानीय ग्रामीण-हम कई बार मरवाही गौरेला के अधिकारियों के पास जाकर बिजली पानी और सुविधा की मांग किये पर ऐसा लगता है कि हम इंसान नहीं है और हमारे लिये कुछ करना उनका कर्तव्य नहीं है। न इलाज मिलता है राशन भी बड़ी मुष्किल से मिलता है बच्चों को पढ़ा नहीं पाते।
बिशुन धनुहार, स्थानीय निवासीः- पिछले साल तक फुलवारी चल रही थी वो भी बंद हो गयी, पानी कितनी दूर से लाना पड़ता है महिलांओं का समय पानी लाने में ही बीत जाता है, जंगली जानवर आए दिन बस्ती में आ जाते है आते जाते हमला करते हैं। नेता और अधिकारी कोई ध्यान नहीं देते।

भोला नायक, उपसरपंच, मटियाडांड़ः- ऐसा कोई भी अधिकारी नहीं होगा जिससे हमने इन धनुहारों के लिये सुविधांए और आवष्यकताओं से अवगत नहीं कराये होंगे। पर कोई भी ध्यान नहीं देता। इनको राशन प्राथमिकता से देने की व्यवस्था पंचायत स्तर पर सुनिष्चित की गयी है पर गांव में बिजली और पानी पहुंच जाए तो इनकी समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। सूखे के हालात है पर फिर भी सरकार इनका ख्याल नहीं रख रही। हम अपने स्तर पर इनका जितना बेहतर कर सकते हैं कर रहे हैं।

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