नम आंखों से बूढे मगर को विदाई…सर्वधर्म के उमड़े लोग…तालाब किनारे अंतिम संस्कार

बिलासपुर—मस्तूरी स्थित लोहर्सी तालाब के अंतिम बूढे मगरमच्छ ने बीती रात दम तोड़ दिया। ग्रामीणों ने मृत मगर को तालाब से बाहर निकाला। मगरमच्छ की मौत पर दुख की। लोगों के बताया कि एक समय लोहर्सी गांव का तालाब मगरमच्छों का बसेरा हुआ करता था। बिलासपुर जिले में मगरमच्छों के कारण लोहर्सी गांव की विशेष पहचान थी। बूढ़े मगरमच्छ की मौत के बाद अब लोहर्सी की पहचान किस्से कहानियों में सिमटकर रह जाएगी।

                   एक समय मगरमच्छों को लेकर बिलासपुर जिले में मस्तूरी स्थित लोहर्सी गांव की खास पहचान थी। लोहर्सी के महादेवा तालाब में एक समय दर्जनों मगरमच्छों का बसेरा हुआ करता था। समय के साथ देखरेख नहीं से मगरमच्छ कम होते गए। लेकिन कैसे कम हुए….मगरमच्छ कहां गए…इस बारे में किसी ने नहीं बताया। वन विभाग ने भी हमेशा की तरह लापता होते मगरमच्छों को गंभीरता से नहीं लिया।

                                पिछले कुछ सालों से महादेवा तालाब में केवल एक मगरमच्छ रह गया था। लोगों का तालाब हमेशा आना जाना रहा। धीरे धीरे ग्रामीणों को भी एकलौते मगरमच्छ से प्यार हो गया।लोग जब भी निस्तारी के लिए तालाब पहुंचते उसे अलग-अलग नामों से बुलाते। कभी मगरमच्छ पानी से बाहर निकलता…तो कभी लोगों की आवाज को अनसुना कर पानी में डूबा रहता। ग्रामीणों ने बताया कि जब महादेवा तालाब में एक दर्जन से अधिक मगरमच्छ थे..तब भी वन विभाग ने ध्यान नहीं दिया। बूढ़े मगर को भी तवज्जों नहीं मिली।

बीती रात बूढ़े मगर ने दम तोड़ दिया। सुबह निस्तारी गए कुछ ग्रामीणों ने देखा कि तालाब के किनारे निठाल पड़ा है। खबर आग की तरह फैल गयी। वन विभाग को सूचित किया गया। वन विभाग अमला मौके पर पहुंचकर मगरमच्छ का पोस्टमार्टम किया। लोगों का जुड़ाव अधिक होने कारण शव को स्थानीय लोगों को सौंप दिया गया।

विधि विधान से हुआ अंतिम संस्कार
                      ग्रामीणों ने बूढे मगरमच्छ का अंतिम संस्कार विधि विधान और रीति रिवाज से किया गया। अंतिम संस्कार में सभी धर्मों के लोग शामिल हुए। सभी लोगों ने अपनी रीति निती से मगरमच्छ को अंतिम विदाई दी। नारियल भेटं के अलावा फूल, गुलाल और इत्र का छिड़काव किया गया। मगरमच्छ का अंतिम क्रिया कर्म महादेव मंदिर के पास किया गया।
लोहर्सी की उपेक्षा
                  लोहर्सी गांव के पढ़े लिखे और जीव जन्तु प्रेंमियों ने बताया कि कोटमी सुनार की तरह लोहर्सी को महत्व नहीं दिया गया। यदि ध्यान दिया जाता तो लोहर्सी को पर्यटन के लिए विकसित किया जा सकता था। जबकि मस्तूरी की भौगोलिक संरचना अभयारण्य के लिये अनुकूल है। पास में ही मोगरा जलाशय है। मगरमच्छ का पालन किया जा सकता था। लेकिन ना तो वन विभाग ने ध्यान दिया और ना ही जिला प्रशासन ने। राजनेताओं ने भी मगरमच्छों की चिंता नहीं की।

कभी नुकसान नहीं पहुंचाया

          गांव के बड़े बुजुर्गों ने बताया कि जब तालाब में एक दर्जन से अधिक मगरमच्छ थे। तब भी मगरमच्छों ने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। लोग आराम से तालाब के अन्दर नहाते थे। बावजूद इसके मगरमच्छो ने किसी भी बच्चे बूढ़े जवान और महिलाओं पर आक्रमण नहीं किया। जानवारों को भी मगरमच्छों ने निशाना नहीं बनाया।

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