घोड़ा और मतदाता..रहमोकरम पर


(सत्यप्रकाश पाण्डेय)”अगर आपको व्यापार में घाटा हो रहा हो… परीक्षा में लगातार असफल हो रहें हों। माशूका किसी बात से रूठकर चली गई हो… घर में बीवी के कलह से परेशान हों या फिर घर में कोई वास्तु दोष हो । सिर्फ 10 रूपये… 10 रूपये में इन सारी समस्याओं का समाधान हमारे पास है । आइये.. आइये केवल 10 रूपये में काले घोड़े की नाल घर ले कर जाइये । हमारी गारंटी है, काले घोड़े की नाल आपकी हर समस्या का अंत है ।”
              caption_sppये शोर कइयों बार आपके कान के परदों को भेदता दिमाग तक पहुँचा होगा । इस तरह का नज़ारा देखकर कोई असहजता भी महसूस नही होती मगर बहुत ही सामान्य सी दिखने वाली इस तस्वीर में मुझे कई असाधारण सी बाते नज़र आईं । आज भी रोज की तरह रोजगार के लिए घर से निकला । ट्रेन में धकियाते, सरकते बिलासपुर से रायपुर पहुँचा । स्टेशन के बाहर धर-दबोचने का भ्रम बनाये खड़े ऑटो वालों की भीड़ से निकलता उस ऑटो में सवार हुआ जिसका चालक पसीने से लथपथ पंडरी.. पंडरी चिल्ला रहा था । अधिकतम 4 की क्षमता वाले ऑटो में मेरे सहित आज 7 लोग सवार थे । स्टेशन से पंडरी पहुँचते पहुँचते… उफ्फ्फ्फ़ । ऑटो से उतरकर आगे बढ़ा ही था कि आस-पास के शोर-शराबे को भेदती किसी लाउडस्पीकर की आवाज कानों में समाई । रुककर देखा,  बात सुनी और एक तस्वीर लेकर आगे बढ़ गया ।
                                      GHODA_MATDATA1जिंदगी की तमाम परेशानियों का समाधान बाबाआदम के जमाने की एक घोड़ा गाडी पर था । कमरतोड़ महँगाई में सिर्फ 10 रूपये में सारी परेशानियाँ ख़त्म कर देने का दावा । काले घोड़े की नाल, सबूत के तौर पर उस गाड़ी में मौजूद चुस्त-दुरुस्त काला घोड़ा । एक टूटी हुई प्लास्टिक की बाल्टी में मालिक की मेहरबानी (दाना) पर मुँह मारता ख़ामोशी से खड़ा था । सब कुछ सामान्य सा… घोड़ा दाने में व्यस्त… दो मुस्टंडे गाड़ी में लदे पास से गुजरने वाले हर इंसान के चेहरे को ताकते । बैटरी चलित चोंगा (लाउडस्पीकर) 10 के नाल की बार-बार उपयोगिता का शोर मचा रहा था । सड़क पर चलने वाले आसमान की तपन से झुलसते यहां-वहां पहुंचने की जल्दबाज़ी में दिखे ।
                                बड़ा ही सामान्य सा दृश्य… पर इस दृश्य को जैसे ही असामान्य तरीके से देखता हूँ तो आज की व्यवस्था का सजीव चित्रण आँखों के सामने आता है । जब इस तस्वीर को सियासी चश्मा लगाकर देखता हूँ तो तस्वीर में घोड़े की भूमिका सबसे अहम् नज़र आती है, जैसे लोकतंत्र में आम मतदाता की । तस्वीर में घोड़ा मालिक की मेहरबानी पर चुपचाप परोसा गया चारा चर रहा है । लोकतंत्र में आम जनता की स्थिति भी इस घोड़े से बेहतर नजर नही आती । छत्तीसगढ़ की सियासी पृष्ठभूमि के मद्देनज़र इस तस्वीर को देखता हूँ तो पाता हूँ, यहां की गरीब और मजबूर जनता भी सरकार के रहमोकरम पर ही रेंग रही है । सरकार चना-चावल, गुड़-नमक सब तो मुफ़्त में बाँट रही है । शिक्षा मुफ़्त, ईलाज का जुगाड़ । यहाँ तक कि हर तीर्थ स्थान तक लाना ले-जाना मुफ़्त । सोचिये कितने दयालु, कृपालु हैं ‘सरकार’। सब कुछ स्वार्थ के लिए… सर पर छत से लेकर पेट की आग बुझाने तक का इंतज़ाम ।
                                  इलाज से लेकर तीर्थ यात्रा का जुगाड़ । सिर्फ …. सियासत के लिए, वोट के लिए । सरकारें इन योजनाओं का ताना-बाना बुनकर गरीब, मेहनतकश को कामचोर और निकम्मा बना चुकी है । मुफ़्त के चावल से बनती और मिलती शराब गरीब मतदाता को नशे का आदि बना चुकी है । नकारा, निकम्मे लोग सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गए हैं । गरीबों को गरीबी की मटमैली, जिल्लतभरी  चादर ओढ़ाकर सरकारें केवल अपना और अपने कद के मुताबिक़ नज़र आते लोगों (उद्योगपति, पूंजीपति) को बढ़ाने के रास्ते खोलते रहीं हैं। प्रशासनिक व्यवस्था को आम जनता की पीठ पर ठीक वैसे ही बैठा दिया गया जैसे घोडा गाड़ी में सवार दो मुस्टंडे । देखें तो सब कुछ व्यवस्था का व्यवस्थित अंग है। इस व्यवस्था का आदि हो चूका ‘घोडा’ आम आदमी की तरह ख़ामोशी से मालिक के रहमोकरम पर जीता हुआ अगले आदेश की प्रतीक्षा में धूप सेंक रहा है ।
                                    गज़ब की विडम्बना है, सूचना क्रांति के सारे दावे और विज्ञान के नित नए आयाम को छू लेने वाले इस देश में आज भी अंधविश्वास की गाड़ी का पहिया घूम रहा है । कोई तोता लिए किसी नुक्कड़ पर बैठा भविष्य के सलोने सपने दिखाकर परिवार पाल रहा है तो कोई सालों साल बिना नहाये आपकी बरक़त के लिए ऊपर वाले से दुआ माँग रहा है ।  कहीं पर 100-200 रूपये में धन वर्षा यंत्र मिल रहा है तो कोई जर्जर दीवारों पर गुप्त रोगों के इलाज का दावा पुतवाकर जिंदगी की गाड़ी अहर्निश हांक रहा है । अब आप ही बताइये ये सामान्य सी नज़र आती तस्वीर हैं न मेरे लिए असामान्य…?

Comments

  1. By Pran chaddha

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